पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ( २४४ ) | पञ्चतन्त्रम् । |
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इसके पीछे चलनेसे बिडालादिकी विपत्ति होती हे सो अब इसकी आराधनासे क्या है। कहा है-
यत्सकाशात्न लाभः स्यात्केवलाः स्युर्विपत्तयः ।
स स्वामी दूरतस्त्याज्यो विशेषादनुजीविभिः ॥ १०२ ॥"
जिसके निकट रहनेसे लाभ न हो केवल विपत्तिही हों वह स्वामी दूरसेही त्यागने योग्य है विशेष करके अनुजीवियोंकोभी त्यागने योग्य है ॥ १०२ ॥"
एवं तेषां वचांसि श्रुत्वा स्वदुर्गं प्रविष्टोऽहम् । यावन्न कश्चित् मम सन्मुखे अभ्येति तावत् मया चिन्तितम् “धिगियं दरिद्रता । अथवा साधु इदमुच्यते-
तब उनके वचन सुनकर मैं अपने दुर्गमें प्रविष्ट हुआ। जब कोई मेरे सन्मुख न प्राप्त हुआ तब मैं विचारने लगा, "इस दरिद्रताको धिक्कार है। अथवा यह अच्छा कहाहै-
मृतो दरिद्रः पुरुषो मृतं मैथनमप्रजम् ।
मृतमश्रोत्रियं श्राद्धं मृतो यज्ञस्त्वदक्षिणः ॥ १०३ ॥
दरिद्रपुरुष मृतकहै सन्तान नहो ऐसा मैथुन (स्त्रीपुरुष समागम) मृतकहै वेदके विना पढे ब्राह्मणका श्राद्ध कराया मृतकवत्है विनादक्षिणाका यज्ञ मृतकहै ॥१०३॥
एवं मे चिन्तयतः ते भृत्या मम शत्रूणां सेवका जाताः ते च मामेकाकिनं दृष्ट्वा विडम्बनां कुर्वन्ति,। अथ मया एकाकिना योगनिन्द्रां गतेन भूयो विचिन्तितम् । “ यत् तस्य कुतपस्विनःसमाश्रयं गत्वा तद्दण्डोपधानवर्त्तिकृतां वित्तपेटां शनैः शनैः विदार्य तस्य निद्रावशं गतस्य स्वदुर्गे तद्वित्तं आनयामि येन भूयोऽपि मे वित्तप्रभावेण आधिपत्यं पूर्ववद्भविष्यति । उक्तञ्च-
इस प्रकार मेरे विचार करनेपर वे मेरे सेवक शत्रुसेवक होगये । वे मुझको इकला देखकर विडम्बना करने लगे । फिर एक समय मुझ इकले योगनिद्राको प्राप्तहुए मैंने विचार किया कि, उस कुतपस्वीके आश्रयको प्राप्त होकर उसके तकियेमें लपेटी हुई वित्तपेटिकाको शनैः २ विदीर्ण करके उसको निद्रामें प्राप्त