पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( २४३ )
न तथा बाध्यते लोके प्रकृत्या निर्धनो जनः ।
यथा द्रव्याणि संप्राप्य तैर्विहीनः सुखे स्थितः ॥ ९७ ॥
प्रकृतिसे निर्धन मनुष्य इस प्रकार नहीं क्लेशित होता है जैसे द्रव्यको प्राप्त होकर फिर उसके बिना दुःखमें स्थित होता है ॥ ९७ ॥
शुष्कस्य कीटखातस्य वह्निदग्धस्य सर्वतः ।
तरोरप्यूषरस्थस्य वरं जन्म न चार्थिनः ॥ ९८ ॥
सूखे कीडके खाये हुए सब प्रकार अग्निमें जले ऊषरमें स्थित वृक्षका भी जन्म सफल है भिक्षुकका नहीं ॥ ९८ ॥
शङ्कनीया हि सर्वत्र निष्प्रतापा दरिद्रता ।
उपकर्तुमपि प्राप्तं निःस्वं सन्त्यज्य गच्छति ॥ ९९ ॥
प्रतापहीन दरिद्रतासे सदा शंका करनी चाहिये, उपकार करनेको प्रवृत्त हुआ भी निर्धन जनको छोडकर चला जाता है ॥ ९९ ॥
उत्क्रम्योत्क्रम्य तत्रैव निर्धनानां मनोरथाः ।
हृदयेष्वेव लीयन्ते विधवास्त्रीस्तनाविव ॥ १०० ॥
निर्धनी पुरुषोंके मनोरथ उठ उठकर वहीं लय हो जाते हैं, अर्थात् विधवाके कुचोंकी समान मनोरथ मनमेंही लीन हो जाते हैं ॥ १०० ॥
व्यक्तेऽपि वासरे नित्यं दौर्गत्यतमसावृतः ।
अग्रतोऽपि स्थितो यत्नान्न केनापीह दृश्यते ॥ १०१ ॥”
प्रगट दिनमेंभी नित्यही दुर्गतिरुपी अंधकारसे आवृत्त हुआ, आगे स्थित हुआभी किसीको दिखाई नहीं देता ॥ १०१ ॥”
एवं विलप्य अहं भग्नोत्साहस्तन्निधानं गण्डोपधानीकृतं दृष्ट्वा स्वं दुर्गं प्रभाते गतः। ततश्च मद्भृत्याः प्रभाते गच्छन्तो मिथो जल्पन्ति-“अहो ! असमर्थोऽयमुदरपूरणेऽस्माकम् । केवलमस्य पृष्ठलग्नानां बिडालादिविपत्तयः तत् किमनेन आराधितेन । उक्तञ्च-
इस प्रकारसे विलापकर मैं भग्नोत्साह होकर उस धनको कंधेके नीचे धरा देखकर प्रभात समय अपने दुर्गमें गया, तब मेरे भृत्य प्रातःकाल जाते हुए परस्पर कहने लगे-“अहो ! यह हमारे उदरपूर्ण करनेमें असमर्थ है और अब