भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( २४२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

अर्थेन बलवान्सर्वो अर्थयुक्तः स पण्डितः ।
पश्यैनं मूषकं व्यर्थं स्वजातेः समतां गतम् ॥ ९२ ॥

धनसे ही सब बलवान् हैं धनवान् ही पंडित हैं अब इस व्यर्थ पुरुषार्थ मूषेको अपनी जातिमें समान हुआ देखो ॥ ९२ ॥

तत् स्वपिहि त्वं गतशंकः । यदस्य उत्पतनकारणं तत् आवयोर्हस्तगतं जातम् । अथवा साधु चेदमुच्यते—

सो तुम निश्शंक होकर शयन करो । जो इसके कूदनेका कारण था सो हमारे हाथमें प्राप्त हुआ है । अथवा यह अच्छा कहा है—

दंष्ट्राविरहितः सर्पो मदहीनो यथा गजः ।
तथार्थेन विहीनोऽत्र पुरुषो नामधारकः ॥ ९३ ॥''

डाहरहित सर्प मदहीन जैसे हाथी इस प्रकार धनके बिना पुरुष नाम-मात्रकाहै ॥ ९३ ॥''

तत् श्रुत्वा अहं मनसा विचिन्तितवान् । "यतोऽङ्गुलिमात्रमपि कूर्द्दनशक्तिर्नास्ति तत् धिक् अर्थहीनस्य पुरुषस्य जीवितम् । उक्तञ्च—

यह सुनकर में मनमें विचारने लगा, "कि अब तो अंगुलिमात्र भी कूदनेकी शक्ति नहीं है सो अर्थहीन पुरुषके जीवनको धिक्कार है। कहाहै—

अर्थेन च विहीनस्य पुरुषस्याल्पमेधसः ।
उच्छिद्यन्ते क्रियाः सर्वा ग्रीष्मे कुसरितो यथा ॥ ९४ ॥

अर्थसे हीन अल्पबुद्धिमान् पुरुषकी सब क्रिया ऐसे नष्ट होजाती हैं जैसे ग्रीष्ममें कुनदी ॥ ९४ ॥

यथा काकयवाः प्रोक्ता यथारण्यभवास्तिलाः ।
नाममात्रा न सिद्धौ हि धनहीनास्तथा नराः ॥ ९५ ॥

जैसे काक यव और जैसे वनके तिल नाममात्र हैं उनसे कुछ सिद्धि नहीं इसी प्रकार धनहीन मनुष्य हैं ॥ ९५ ॥

सन्तोऽपि न हि राजन्ते दरिद्रस्येतरे गुणाः ।
आदित्य इव भूतानां श्रीर्गुणानां प्रकाशिनी ॥ ९६ ॥

दरिद्रके दूसरे गुण हों तो भी उनकी शोभा नहीं होती जैसे सूर्यसे पदार्थोंका प्रकाश होता है इसी प्रकार लक्ष्मी गुणोंका प्रकाश करती है ॥ ९६ ॥