पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
पृष्ठ 256, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम्। (२४१)
मार्गसे आकर उपस्थित हुआ । और फिर अपने हाथसे खोदना प्रारंभ किया । तब खोदते हुए उसने वह निधि पाई जिसके ऊपर मैं अहंकारसे निवास करता था, जिसकी गरमीसे महादुर्गकोभी जा सक्ता था । तब प्रसन्न होकर ताम्रचूडसे अभ्यागत बोला,-“भो भगवन् ! अब निश्शंक शयन करो। इसीकी गरमीसे यह मूषक आपको जगाताहै”। यह कह दोनो धनको ले मठकी ओरको चले और मैंभी जबतक निधान रहित स्थानको प्राप्त होताहू तबतक अशोभित उद्वेगकारक उस स्थानको देखनेमें भी समर्थ न होकर विचारने लगा" क्या करू कहा जाऊ कैसे मेरे मनकी शान्ति हो ?”। इस प्रकार महाकष्टसे वह दिन बीता । फिर सूर्यके अस्तमें उद्वेगसे उत्साहहीन होकर उस मठमें परिवारसहित प्रविष्ट हुआ तब हमारे परिवारके शब्दको सुनकर ताम्रचूड फिरभी भिक्षापात्रको जर्जर वाससे ताडन करने लगा । तब यह अभ्यागत बोला-“सखे ! क्यों अब भी निश्शंक होकर नहीं सोता है ?” । वह बोला-“भगवन् ! फिर भी आया वह दुष्टात्मा मूषक परिवार सहित । उसके भयसे जर्जर बाशमे भिक्षापात्रको ताडन करता हूं”। तब हँसकर अभ्यागत बोला,-“सखे ! मत डर धनके सहितही इसके कूदनेका उत्साह नष्ट हुआ है सब जन्तुओंकी यही स्थितिहै, कहाहै ।
यदुत्साही सदा मर्त्यः पराभवति यज्जनान् ।
यदुद्धतं वदेद्वाक्यं तत्सर्वं वित्तजं बलम् ॥ ९१ ॥
जो मनुष्य सदा उत्साही है और मनुष्योंको पराभव करता है जो उद्धत वाक्य कहता है वह सब धनका उत्पन्न हुआ बल जानो ॥ ९१ ॥
अथ अहं तत् श्रुत्वा कोपाविष्टो भिक्षापात्रमुद्दिश्य विशे-
षादुत्कूर्दितोऽप्राप्त एव भूमौ निपतितः । तत श्रुत्वा
असौ मे शत्रुर्व्हिहस्य ताम्रचूडमुवाच-“भोः पश्य पश्य
कौतूहलम् ” । आह च-
तब मै यह सुन क्रोधित हो भिक्षापात्रकी ओरको विशेष कूदने लगा पर वहा न पहुंचकर भूमिमें गिरा यह सुन यह मेरा शत्रु हँसकर ताम्रचूड-से बोला-“भो ! देखो २ कुतूहल-“बोला भी-
१६