भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 536 में से

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भाषाटीकासमेतम् । (२४९)

योग्य अर्थको प्राप्त होता है" इत्यादि । फिर ओरभी किसीके पूछनेपर उसने यही कहा । इस प्रकार नगरमें उसका नाम प्राप्तव्यमर्थ हुआ । तब राजकन्या चन्द्रवतीनाम नये रूपयौवनसे सम्पन्न दूसरी सखीको साथ लिये एक महोत्सबके दिनमें नगरको देखती हुई आई, वहाही कोई राजपुत्र अत्यन्त रूपसम्पन्न मनोहर किसीप्रकार उसके दृष्टिगोचर हुआ, उसके दर्शनकरतेही कुसुमबाणसे हत हुई उसने अपनी सखीसे कहा- "सखि ! अवश्यही जिसप्रकार इससे समागम होजाय ऐसा तुम यत्न करो" । यह सुन वह सखी उसके पास जाकर शीघ्र बोली- 'मुझे चन्द्रवतीने तुम्हारे पास भेजाहे और उसने तुमसे कहाहे कि, तुम्हारे दर्शनसेही कामदेवने मेरी मृत्युदशा करदी सो यदि शीघ्रही हमारे निकट न आओगे तो मैं मरणको शरणलूंगी,” यह सुनकर उसने कहा- "यदि अवश्य मैं वहा आऊ तो बताओ किस उपायसे आऊ" । तब सखीने कहा- "रात्रिमें महलपरसे लम्बायमान कठिन रस्सीके सहारे तुम यहा चढि आना" । वह बोला,- "जो तुम्हारा यह निश्चय है तो मैं वही करूंगा," ऐसा निश्चयकर सखी चन्द्रावतीके समीप गई । तब रात होनेपर वह राजपुत्र अपने मनमें विचारने लगा ! "अहो यह बडा कुकर्म है । कहाहै-

गुरोः सुतां मित्रभार्य्यां स्वामिसेवकगेहिनीम् ।
यो गच्छति पुमांल्लोके तमाहुर्ब्रह्मघातिनम् ॥ ११६ ॥

गुरुकन्या, मित्रकी भार्या, स्वामि सेवककी स्त्री इनसे जो पुरुष ससारमें गमन करता है उसे ब्रह्मघाती कहतेहैं ॥ ११६ ॥

अपरञ्च-
औरभी-

अयशः प्राप्यते येन येन चापगतिर्भवेत् ।
स्वर्गाच्च भ्रश्यते येन तत्कर्म्म न समाचरेत् ॥ ११७ ॥"

जिससे अयशहो जिसकर्मसे दुर्गतिहो जिसकर्मसे स्वर्गसे भ्रष्टहो वह कर्म नकरे ॥ ११७ ॥"

इति सम्यग्विचार्य्य तत्सकाशं न जगाम । अथ प्राप्तव्यमर्थः पर्य्यटन् धवलगृहपार्श्वे रात्रावलम्बितवरत्रां दृष्ट्वा कौतुकाविष्टहृदयः तामालम्ब्य अधिरूढः। तथा च राज-