पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( २९३ )
कार्य किया जाताहै उसका ऐसाही फल होताहै” । यह विचार दुःखी हो उसने इसे निकाल दिया, सो वह जबतक मार्गमे जाता है तबतक वरकीर्तिनाम वर और देशका रहनेवाला बडे बाजे गाजेसे आया । प्राप्तव्यमर्थभी उनके साथ जाने लगा, सो जबतक लग्नसमय प्राप्त हो कि, राजमार्गमे स्थित श्रेष्ठीके गृहद्वारमे कि, जहा रत्नमण्डपकी वेदीमें विवाहके निमित्त मगलका वेश किया वणिक्पुत्री स्थित थी, तबतक मदमत्त हाथी आरोहकको मारकर नष्ट होते जनोके कोलाहल-के साथ लोकको व्याकुल करता हुआ उसी स्थानमे प्राप्त हुआ । उसको देखकर सब वराती वरके सग प्रनष्ट होते दिशाओमें गये । उसीसमय भयसे चंचल नेत्र-वाली इकली कन्याको देखकर “मतडरो मैं रक्षकहू” इस प्रकार धीरतापूर्वक निश्चय करके दक्षिण हाथ पकडकर महा साहसपनसे प्राप्तव्यमर्थ कठोर वाक्योंसे हाथीको घुडकता हुआ, तब किसी प्रकारसे दैवयोगसे हाथीके हट जानेसे सुहृद्बान्धवोंके साथ लग्नसमय बीत जानेसे वरकीर्तिने आकर तत्रतक उस कन्याको अन्यके हाथमें प्राप्त हुई देखकर कहा,-“भो श्वशुर ! यह आपने विरुद्ध किया जो मुझको देकरके कन्या औरको दी” वह बोला,-“भो ! मैंभी हाथीके डरसे भागा हुआ, आपके सग आयाहू न जाने यह क्या हुआ” । ऐसा कह बेटीसे पूछने लगा, “वत्से ! यह तैने अच्छा न किया, सो कह यह क्या वृत्तान्त है?” वह बोली-“इसने मेरी प्राणसकटसे रक्षा की है सो इसको छोडकर मुझ जीती हुईका हाथ कोई न ग्रहण करेगा” । इस बातमे रात बीतगई । तब प्रातःकाल होनेपर महाजनोंके समूहमें इस वार्ताका व्यतिकर सुनकर राजदुहिता उस स्थानमें आई । कर्णपरपरासे सुनकर दण्डपाशकी कन्याभी उस स्थानमें आई। तब उस महाजनके समूहको सुनकर राजाभी उस स्थानमें आगया । तब प्राप्तव्यमर्थसे बोला,-“भो ! निडर कहो यह कैसा वृत्तान्त हे” । तब वह बोला,-“मनुष्य प्राप्तव्य अर्थको प्राप्त होताहै” राजकन्या बोली,-“देवभी उसको लघन करनेको समर्थ नहीं है” । तब दण्डपाशकसुता बोली,-“इस कारण न मैं कुछ सोचती हू न कुछ मुझे विस्मय है” इस अखिल लोकके वृत्तान्तको सुनकर वणिक्सुता बोली,-“जो हमारा है सो दूसरेका नही” । अभयदान देकर राजाने पृथक् २ वृत्तान्त पूछा उस वृत्तान्तको जान प्राप्तव्यमर्थके वास्ते अपनी कन्याको बहुत मानके सहित सम्पूर्ण अलकारसे परिवारसे युक्त देकर “तृ