पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २९२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
कारपरिवारयुतां दत्त्वा त्वं मे पुत्रोऽसीति नगरविदितं तं यौवराज्येऽभिषिक्तवान् । दण्डपाशकेनापि स्वदुहिता स्वशक्त्या वस्त्रदानादिना सम्भाव्य प्राप्तव्यमर्थाय प्रदत्ता । अथ प्राप्तव्यमर्थेनापि स्वीयपितृमातरौ समस्तकुटुम्बावृतौ तस्मिन्नगरे सम्मानपुरःसरं समानीतौ । अथ सोऽपि स्वगोत्रेण सह विविधभोगानुपभुञ्जानः सुखेन अवस्थितः। अतोऽहं ब्रवीमि-
यह विचारकर उसके पास न गया, उस समय वह (प्राप्तव्यमर्थवाला) घूमता हुआ श्वेत घरके निकट रात्रिमे लम्बायमान रस्सी (कमन्द) को देखकर कौतुकयुक्त हृदयसे उसको पकडकर गया। उस राजपुत्रीने यह वहीहै इस प्रकार जान सन्तुष्टचित्तसे स्नान भोजन पानाच्छादनादिसे सन्मान किया उसके संग शय्यामें सोती हुई उसके अंगस्पर्शसे प्राप्त हुए हर्षसे रोमांचित शरीर हो उसने कहा—“तुम्हारे दर्शनमात्रसे अनुरक्त हुई मैंने अपना आत्मा तुमको दिया, तुमको छोडकर और स्वामी स्वप्नमेंभी मेरे न होगा, सो मेरे साथ आलाप क्यों नहीं करते”। वह बोला,—“मनुष्य प्राप्त होनेयोग्य अर्थकोही प्राप्त होताहै”। ऐसा कहनेपर यह और है ऐसा उसने विचार अपने धवलगृहसे उतारकर छोड-दिया, वह किसी टूटे देवमंदिरमें जाकर सो गया। तब वहां किसा कुलटाका संकेत किया हुआ जबतक नगररक्षक प्राप्त हुआ, उससे पहलेही यह सोगयाथा उसने देखकर इस गुप्तभेद छिपानेके लिये पूछा,—“आप कौनहै”। वह बोला “मनुष्य प्राप्त होने योग्यही अर्थको प्राप्त होताहै”। यह सुनकर वह दण्डपाशक बोला—“यह देवगृह शून्यहै। सो मेरे स्थानमें जाकर सोरह”। “बहुत अच्छा” ऐसा कह बुद्धिकी विपरीततासे अन्य स्थानमें सोगया, उस रक्षककी कन्या नियमवती नामवाली रूपयौवनसे सम्पन्न किसी पुरुषमें अनुरक्त हुई संकेत देकर उस स्थानमें सोगईथी तब यह उसको आया देख यही मेरा प्रियहै ऐसा रात्रीके घने अंधकारसे मोहित हुई उठकर भोजनाच्छादि क्रियाको कराकर गान्धर्वरितिसें अपना विवाहकर उसके संग शयनमें स्थित हुई खिले मुखकमलसे उससे बोली “अबभी क्यों निडर होकर तुम मुझसे नहीं बोलते”। वह बोला—“मनुष्य प्राप्तव्य अर्थको प्राप्त होताहै”। यह सुन उसने विचार किया, “जो बिना विचारे