भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( २५६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

अतएव विवेकिनो जितात्मानो धनस्पृहां न कुर्वन्ति । उक्तञ्च- इसी कारण ज्ञानी और आत्माके जीतनेवाले पुरुष धनमें स्पृहा नहीं करते हैं। कहा है-

सुसञ्चितैर्जीवनवत्सुरक्षितै र्निजेऽपि देहे न वियोजितैः क्वचित् । पुंसो यमान्तं व्रजतोऽपि निष्ठुरै- रेतैर्धनैः पञ्चपदी न दीयते ॥ १२४ ॥

अति कष्टसे संचित किये प्राणकी समान रक्षित अपनी देहसे किसी प्रकारभी न नियुक्त किये निष्ठुरधन यमलोकको जाते मनुष्यके पीछे पांच पदभी गमन नहीं करते हैं ॥ १२४ ॥

अन्यञ्च- औरभी-

यथामिषं जले मत्स्यैर्भक्ष्यते श्वापदैर्भुवि । आकाशे पक्षिभिश्चैव तथा सर्वत्र वित्तवान् ॥ १२५ ॥

जैसे मांस जलमें मच्छोंसे, पृथ्वीमें हिंसक जीवोंसे, आकाशमें पक्षियोंसे खाया जाता है। इसी प्रकार सर्वत्र धनवान् खाया जाता है ॥ १२५ ॥

निर्दोषमपि वित्ताढ्यं दोषैर्योजयते नृपः । निर्धनः प्राप्तदोषोऽपि सर्वत्र निरुपद्रवः ॥ १२६ ॥

निर्दोषी धनीकोभी राजा दोषसे दूषित करता है, और निर्धनी दोषको प्राप्त होकरभी सदा उपद्रवसे हीन रहता है ॥ १२६ ॥

अर्थानामर्जने दुःखमर्जितानां च रक्षणे । नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थान्कष्टसंश्रयान् ॥ १२७ ॥

धनके इकट्ठा करनेमे दुःख, इकट्ठा कियेके रक्षा करनेमें दुःख, नाशमें दुःख, खर्चमें दुःख, कष्टके आश्रयवाले धनको धिक्कार है ॥ १२७ ॥

अर्थार्थी यानि कष्टानि मूढोऽयं सहते जनः । शतांशेनापि मोक्षार्थी तानि चेन्मोक्षमाप्नुयात् ॥ १२८ ॥

यह मूढमनुष्य धनके निमित्त जितना कष्ट सहता है मोक्षकी इच्छावाला उसके सौ वें अंश परिश्रम करे तो मुक्त होजाय ॥ १२८ ॥