पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( २५७ )
अपरं च-
औरभी-
विदेशवासजमपि वैराग्यं त्वया न कार्य्यम् । यतः-
विदेशके निवास करनेसे उत्पन्न हुआ वैराग्यभी तुमको करना न चाहिये । क्यो कि-
को धीरस्य मनस्विनः स्वविषयः को वा विदेशः स्मृतो
यं देशं श्रयते तमेव कुरुते बाहुप्रतापार्जितम् ।
यदंष्ट्रानखलांगुलप्रहरणैः सिंहो वनं गाहते
तस्मिन्नेव हतद्विपेन्द्ररुधिरैस्तृष्णां छिनत्यात्मनः ॥ १२९॥
धीर बुद्धिमान्को अपना देश क्या है ? विदेश क्या है ? वह जिस देशमें निवास करता हे उसीको भुजाओके प्रतापसे जीत लेता है जो कि, डाढ नख पूंछके प्रहारसे सिंह वनमें फिरता है, उसी वनमें मारे हुए हाथीके रुधिरसे अपनी तृष्णाको दूर करता है ॥ १२९ ॥
अर्थहीनः परे देशे गतोऽपि यः प्रज्ञावान् भवति स कथ-
ञ्चिदपि न सीदति । उक्तञ्च-
धनहीन परदेशमे गया हुआभी यदि बुद्धिमान् हो तो किसी प्रकार दुःखी नहीं होता है । कहा है-
कोऽतिभारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम् ।
को विदेशः सुविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम् ॥ १३० ॥
शक्तिमानोंको अतिभार क्या है ? व्योपारियोंको दूर क्या है ? विद्यावानोंको विदेश क्या है ? प्रियवादियोंको पर क्या है ? ॥ १३० ॥
तत् प्रज्ञानिधिर्भवान् न प्राकृतपुरुषतुल्यः, अथवा-
सो आप तो बुद्धिके सागर है साधारण मनुष्यके तुल्य नहीं हैं । अथवा-
उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं
क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम् ।
शूरं कृतज्ञं दृढसौहृदञ्च
लक्ष्मीः स्वयं मार्गति वासहेतोः ॥ १३१ ॥
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