पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम्। (२५९)
किसी स्थानमें सोमिकक नाम कौलिक रहता था, वह अनेक प्रकार पटरचनासे रजित राजाओंके योग्य वस्त्र सदा बनाता था और उसके अनेकविध पटरचनामें निपुण होकरभी भोजनाच्छादनसे अधिकधन न प्राप्त होता और दूसरे साधारण जुलाहे मोटे वस्त्र बुनना जानने वाले बडे धनवाले थे । उनको देखकर यह अपनी भार्यासे बोला,–"प्रिये ! इन मोटे कपडे बनाने वालोंको देखो जो धन सुवर्णसे सम्पन्न हैं । सो यह स्थान हमको लेना फागना नहीं है । सो और स्थानमें धन उपार्जनके निमित्त जाताहू " । वह बोली,--“ भो प्रियतम ! यह सब मिथ्या प्रलाप है जो और स्थानमे जाकर धन होता है अपने स्थानमे नहीं होता । कहा है–
उत्पतन्ति यदाकाशे निपतन्ति महीतले ।
पक्षिणां तदपि प्राप्या नादत्तमुपतिष्ठति ॥ १३३ ॥
जो आकाशमें उडते पृथ्वीमे गिरते हैं उन पक्षियोंकोभी बिनादिया अन्न प्राप्त नही होता है ॥ १३३ ॥
तथाच–
तैसेही–
न हि भवति यन्न भाव्यं भवति च भाव्यं विनापि यत्नेन ।
करतलगतमपि नश्यति यस्य तु भवितव्यता नास्ति ॥ १३४ ॥
जो होनहार नहीं है वह नहीं होता है जो होनहार है वह यत्नके बिनाही होजाता है जिसकी प्राप्ति नहीं है वह हाथमे प्राप्त हुआ भी नष्ट होजाता है ॥ १३४ ॥
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् ।
तथा पुरा कृतं कर्म कर्त्तारमनुगच्छति ॥ १३५ ॥
जैसे सहस्र धेनुओंमें बछडा माताको पहचानता है इसी प्रकार पूर्व किया कर्म कर्ताको पहुचता है ॥ १३५ ॥
शेते सह शयानेन गच्छन्तमत्तुगच्छति ।
नराणां प्राक्तनं कर्म तिष्ठेत्त्वथ सहात्मना ॥ १३६ ॥
सोतेके साथ सोता है, चलतेके साथ चलता है, बहुत क्या मनुष्योका किया कर्म आत्माके साथ रहता है ॥ १३६ ॥
यथा छायातमौ नित्यं सुसम्बद्धौ परस्परम् ।
एवं कर्म च कर्ता च संश्लिष्टावितरेतरम् ॥ १३७ ॥