भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

भाषाटीकासमेतम् । ( २६३ )

भोगरहितेन धनेन ? यतः तव भोजनाच्छादनाभ्यधिका प्राप्तिरपि नास्ति । उक्तञ्च-

सो जबतक यह कौलिक जागकर उस मोहरोंकी गांठको देखता है तबतक रीती देखकर खेदसे विचारने लगा । "अहो यह क्या है ? बड़े कष्टसे उपार्जन किया धन लीलासेही कहां गया । सो व्यर्थ श्रमवाला निर्धनी मैं किस प्रकारसे अपनी स्त्री और मित्रोको मुख दिखलाऊंगा" । ऐसा निश्चय कर उसी स्थानको गया । वहा तीन वर्षमें पाचसौ अशरफी उत्पन्न कर फिरभी आपने स्थानको चला । जब कि, जाते हुए अर्धमार्गमें सूर्य अस्त हुए तब सुवर्णके नाश होनेके भयसे थककर भी वह न सोया और केवल घरमे मन लगाये शीघ्रतासे चला । तब दो पुरुष सामनेसे आते वार्ता करते उसने सुने । उनमेंसे एक बोला—“भो प्रभो ! तुमने क्यो इसको पाचसौ सुवर्ण दिये । सो क्या तू नहीं जानता है कि, भोजनाच्छादनसे अधिक इसके भाग्यमे कुछ नहीं है ” । वह बोला—“भो कर्मन् ! उद्योगियोंको मैं अवश्य देताहू । उसका परिणाम तुम्हारे अधीनहै । सो क्यों मेरा तिरस्कार करते हो” । यह सुनकर सोमिलक जबतक गांठको देखता है तबतक सुवर्ण नहीं पाया, तब तो परम दुःखको प्राप्त होकर विचारने लगा, “अहो धनहीन मेरे जीवनसे क्या है ? सो इस वटवृक्षमें अपनेको बाधकर प्राणत्यागन करूं” । ऐसा विचार कुशकी रस्सी बनाय अपने कठमे पाश डाल शाखामे अपनेको बाध जबतक अपनेको छोड़ता है तबतक एक पुरुष आकाशमें स्थित हुआ यह बोला,-“भो भो सोमिलक ! इस प्रकारका साहस मत कर मैं तेरे धनका हरण करनेवाला । भोजनाच्छादनस अधिक एक कौडी भी तेरेपास नहीं रहने देता । सो अपने घरको जा,तुम्हारे साहससे मैं संतुष्ट हुआहूं । मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं होता सो कोई अभीष्ट वर माग,” सोमिलक बोला—“जो ऐसा है तो मुझको बहुत धन दो” । वह बोला,-“भोगरहित धनको लेकर क्या करेगा क्यों कि तुझको भोजनाच्छादनसे अधिक प्राप्ति नहीं है । कहा है-

किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला ।
या च वेश्येव सामान्या पथिकैरुपभुज्यते ॥ १४४ ॥

उस सम्पत्तिसे क्या है जो पुत्रवधूकी समान केवल अभोग्य है जो साधारण वेश्याकी समान पथिकोंसे भोगी जाती है वही अच्छी है ॥ १४४ ॥ ”