भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( २७१ )

"गृहमध्यनिखातेन धनेन धनिनो यदि ।
भवाम किं न तेनैव धनेन धनिनो वयम् ॥ १५९ ॥"

"घरमे गाडे हुए धनस ही यदि धनवान् धनी हो तो उसी धनसे हम क्यों न धनी गिने जायें ? ॥ १५९ ॥

तथाच-
तैसेही-

उपार्जितानामर्थानां त्याग एव हि रक्षणम् ।
तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम् ॥ १६० ॥

उपार्जन किये धनोंका त्याग ही रक्षा है जैसे सरोवरके मध्यमे स्थित जलोंका निकलना ॥ १६० ॥

दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये सञ्चयो न कर्त्तव्यः ।
पश्येह मधुकरीणां सञ्चितमर्थं हरन्त्यन्ये ॥ १६१ ॥

देना चाहिये, भोगना चाहिये, परन्तु धनका सचय न करना देखो मधुमक्खियोका सञ्चित शहद अन्य जन हरण करते हैं ॥ १६१ ॥

अन्यच्च-
औरभी-

दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य ।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति ॥ १६२ ॥

दान, भोग और नाश यह धनकी तीन गति होती हैं जो न देता न खाता है उसकी तीसरी गति ( धनका नाश ) होती है ॥ १६२ ॥

एवं ज्ञात्वा विवेकिना न स्थित्यर्थं वित्तोपार्जनं कर्त्तव्यं यतो दुःखाय तत् । उक्तञ्च-

ऐसा जानकर ज्ञानियोंको जोडनेके निमित्त धन उपार्जन करना न चाहिये जिससे कि वह दुखके निमित्त होताहै । कहाहै-

धनादिकेषु खिद्यन्ते येऽत्र मूर्खाः सुखाशयाः ।
तप्तग्रीष्मेण सेवन्ते शैत्यार्थं ते हुताशनम् ॥ १६३ ॥

सुखकी आशासे जो महामूर्ख धनादिमे खिद्यमान रहतेहैं, वे तप्त गरमीसे आर्तहुए शीतके निमित्त अग्निकी खोज करतेहैं ॥ १६३ ॥