भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( २७२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

सर्पाः पिबन्ति पवनं न च दुर्बलास्ते
शुष्कैस्तृणैर्वनगजा बलिनो भवन्ति ।
कन्दैः फलैर्मुनिवरा गमयन्ति कालं
सन्तोष एव पुरुषस्य परं निधानम् ॥ १६४ ॥

सर्प पवन पीतेहैं परन्तु वे दुर्बल नहीं हैं सूखे तृण खाकरही वनके हाथी बली होतेहैं, मुनिश्रेष्ठ कन्द और फलसे समयको बितातेहैं इससे सन्तोषही पुरुषोंका परम निधान ( आश्रय ) है ॥ १६४ ॥

सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम् ।
कुतस्तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम् ॥ १६५ ॥

सन्तोषरूपी अमृतसे तृप्त हुए शान्त चित्तवालोंको जो सुखहै वह धनके लोभसे इधर उधर धावमान होते हुए पुरुषोंको कहां है ॥ १६५ ॥

पीयूषमिव सन्तोषं पिबतां निर्वृतिः परा ।
दुःखं निरन्तरं पुंसामसन्तोषवतां पुनः ॥ १६६ ॥

अमृतकी समान सन्तोषको पान करनेसे परम शान्ति होतीहै असन्तोषी पुरुषोंको निरन्तर दुःख होताहै ॥ १६६ ॥

निरोधाच्चेतसोऽक्षाणि निरुद्धान्यखिलान्यपि ।
आच्छादिते रवौ मेघैराच्छन्नाः स्युर्गभस्तयः ॥ १६७ ॥

चित्तके रुकनेसे सब इन्द्रिय रुक जातीहैं जैसे मेघके ढकनेसे सूर्यकी किरणेंभी ढकजातीहैं ॥ १६७ ॥

वाञ्छाविच्छेद नं प्राहुः स्वास्थ्यं शान्ता महर्षयः ।
वाञ्छा निवर्त्तते नार्थैः पिपासेवाग्निसंवनैः ॥ १६८ ॥

शान्त चित्तवाले महर्षि वासनाके विच्छेदको सुख कहतेहैं अग्निके सेवनसे प्यास जैसे निवृत्त नहीं होती ऐसेही धनसे वांछा निवृत्त नहीं होती ॥ १६८ ॥

अनिन्द्यमपि निन्दन्ति स्तुवन्त्यस्तुत्यमुच्चकैः ।
स्वापतेयकृते मर्त्याः किं किं नाम न कुर्वते ॥ १६९ ॥

मनुष्य धनके निमित्त अनिन्दितकी भी निन्दा करते हैं स्तुतिके अयोग्यकी भलीप्रकार स्तुति करतेहैं बहुत क्या ? क्या क्या नहीं करतेहैं ॥ १६९ ॥