भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 289

( २७४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

अप्रियाण्यपि पथ्यानि ये वदन्ति नृणामिह ।
त एव सुहृदः प्रोक्ता अन्ये स्युर्नामधारकाः ॥ १७५ ॥ ”

इस संसारमें जो मनुष्य अप्रिय तथा हितकारी वाक्योंको कहतेहैं वेही सुहृदहैं दूसरे नामधारीहैं ॥ १७५ ॥ ”

अथ एवं जल्पतां तेषां चित्रांगो नाम हरिणो लुब्धकत्रासितः तस्मिन् एव सरसि प्रविष्टः । अथ आयान्तं ससम्भ्रममवलोक्य लघुपतनको वृक्षमारूढः । हिरण्यको निकटवर्तिनं शरस्तम्बं प्रविष्टः । मन्थरकः सलिलाशयमास्थितः । अथ लघुपतनको मृगं सम्यक् परिज्ञाय मन्थरकं उवाच,—“एहि एहि सखे मन्थरक ! मृगोऽयं तृषार्त्तोऽत्र समायातः सरसि प्रविष्टः । तस्य शब्दोऽयं न मानुषसम्भवः” इति । तच्छ्रुत्वा मन्थरको देशकालोचितमाह,—“भो लघुपतनक ! यथा अयं मृगो दृश्यते प्रभूतं उच्छ्वासं उद्वहन् उद्भ्रान्तदृष्ट्या पृष्ठतोऽवलोकयति तन्न तृषार्त्त एव नूनं लुब्धकत्रासितः । तज्ज्ञायतामस्य पृष्ठे लुब्धका आगच्छन्ति न वा इति । उक्तञ्च—

इस प्रकार उनके वचन कहनेपर चित्राङ्ग नामक एक हरिण लुब्धकसे घबड़ाया हुआ उस सरोवरमें प्रविष्ट हुआ । तब उसको भयसे व्याकुल आया हुआ देखकर लघुपतनक वृक्षपर चढ़ा, हिरण्यक समीपवर्ती शरके स्तम्भमें प्रविष्ट हुआ, मन्थरक सरोवरमें घुस गया । तब लघुपतनक मृगको अच्छी प्रकार जानकर मन्थरकसे बोला,—“आओ आओ सखे मन्थरक ! यह मृग तृषासे व्याकुल यहां आकर सरोवरमें प्रविष्ट हुआहै । यह उसीका शब्दहै यहां मनुष्यका सम्भव नहींहै” । यह सुनकर मन्थरक देशकाल उचित वचन बोला,—“भो लघुपतनक ! जिसप्रकार यह मृग दीखताहै, बडे श्वास लेताहुआ चकित दृष्टिसे पीछेको देखताहै सो यह प्यासा नहींहै अवश्यही व्याधसे भीतहै । सो जाना जाय कि इसके पीछे लुब्धक आते हैं या नहीं । कहा है—

भयत्रस्तो नरः श्वासं प्रभूतं कुरुते मुहुः ।
दिशोऽवलोकयत्येव न स्वास्थ्यं व्रजति क्वचित् ॥ १७६ ॥

भयसे व्याकुल हुआ मनुष्य बारंबार श्वास लेताहै चारों ओर दिशाओंको दखता रहता है और स्वास्थ्यको प्राप्त नहीं होताहै ॥ १७६ ॥