भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( १४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

किस एक नगरके समीप किसी वैश्यपुत्रने वृक्षमण्डलके मध्यमें देवस्थान बनाना प्रारंभ किया, उसमें जो कर्मचारी थे शिल्पी आदि वे दोपहरके समय भोजनके निमित्त नगरमें जातेथे । एक समय अपनी जातिके अनुक्रमसे प्राप्त वानरयूथ इधर उधर घूमता हुआ आया, वहां किसी एक कारीगरका आधा चीरा हुआ अञ्जनवृक्षका काष्ठस्तम्भ बीचमें खैरकी खूंटी अडाया हुआ था, इसी समय वे वानर वृक्षोंके शिखर प्रासाद श्रृंग तथा काष्ठके चारों ओर क्रीडा करना प्रारम्भ करते हुए एक उनमेंसे निकटमृत्युवाला चंचलतासे उस आधे फाडे हुए स्तम्भपर बैठकर हाथसे उस खूंटको पकड ज्योंही उखाडने लगा कि त्योंही उसके स्तम्भके छिद्रमें लटके हुए वृषणो (अंडकोष) की अपने स्थानसे कीलीके उखडनेसे जो दशा हुई है सो पहलेही निवेदन कर दी है । इससे मैं कहता हूं “अनधिकारमे” इत्यादि । हम दोनोंका खानेसे बचा भोजन स्थित है ही, फिर इस व्यापारसे क्या है” । दमनकने कहा- “तो क्या आप केवल आहारमात्रकी इच्छा करते हो ? सो युक्त नहीं है, कहा है कि-

सुहृदामुपकारकारणाद्विद्विषतामप्यपकारकारणात् । नृपसंश्रय इष्यते बुधैर्जठरं को न बिभर्ति केवलम् ॥ २२॥

मित्रोंका उपकार करनेसे, शत्रुओंका अपकार करनेसे बुद्धिमान् राजाका आश्रय करते हैं, केवल पेट कौन नहीं भरता है ॥ २२ ॥

किञ्च-
कारण कि,

यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहवः सोऽत्र जीवतु । वयांसि किं न कुर्वन्ति चञ्च्चा स्वोदरपूरणम् ? ॥ २३ ॥

जिसके जीनेसे बहुतसे पुरुष जियें, सोई जीता है और पक्षी क्या चोंचसे अपना उदरपूर्ण नहीं करते हैं ? ॥ २३ ॥

तथाच-
औरभी-

यज्जीव्यते क्षणमपि प्रथितं मनुष्यैर्विज्ञानशौर्यविभवार्य्य-
गुणैः समेतम् । तन्नाम जीवितमिह प्रवदन्ति तज्ज्ञाः काको-
ऽपि जीवति चिरञ्च बलिं च भुंक्ते ॥ २४ ॥