पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम्। (२८९)
रात्रिमें आकर सदाही उस न्यग्रोधके चारों ओर घूमताथा । और यह उलूकराज पूर्व विरोधके वशसे जिस किसी वायसको पाता उसे मार जाता इस प्रकार नित्यके आगमनसे शनैः २ वह न्यग्रोधका वृक्ष सब ओरसे उसने वायसरहित कर दिया अथवा ऐसा होताही है, यह कहा भी है-
य उपेक्षेत शत्रुं स्वं प्रसरन्तं यदृच्छया । रोगं चालस्यसंयुक्तः स शनैस्तेन हन्यते ॥ २ ॥
जो अपनी इच्छासे वृद्धिको प्राप्त हुए शत्रु और रोगकी उपेक्षा करताहै। आलस्य युक्त रहता हे वह शनै. २ उससे हनन होता है ॥ २ ॥
तथाच- तैसेही-
जातमात्रं न यः शत्रुं व्याधिश्च प्रशमं नयेत् । अतिपुष्टाङ्गयुक्तोऽपि स पश्चात्तेन हन्यते ॥ ३ ॥
जो उत्पन्न होतेही शत्रु और व्याधीको शान्त नहीं करता है अति पुष्ट अंग होकरभी पीछे वह उसीसे मारा जाता है ॥ ३ ॥
अथ अन्येद्युः स वायसराजो सर्वान् वायससचिवानाहूय प्रोवाच-“भो ! उत्कटः तावदस्माकं शत्रुः उद्यम सम्पन्नश्च कालवशात् नित्यमेव निशागमे समेत्य अस्मत्पक्षकदंनं करोति, तत् कथमस्य प्रतिविधानम् ? वयं तावद्रात्रौ न पश्यामः । न च तस्य दिवा दुर्गं बिजानीमः येन गत्वा प्रहरामः। तदत्र विषये किं युज्यते,सन्धिविग्रहयानासनसंश्रयद्वैधीभावानामेकतमस्य क्रियमाणस्य । तद्विचार्य्य शीघ्रं कथयन्तु भवन्तः'’अथ ते प्रोचुः-“युक्तमभिहितं देवेन यद्वा एष प्रश्नः कृतः । उक्तञ्च-
तब और दिन वह काकराज सम्पूर्ण वायस मन्त्रियोंको बुलाकर बोला,-"भो हमारा शत्रु तो बडा बली और उद्यम सम्पन्न है । कालवशसे नित्यही रात्रिमें आकर हमारी जातिका नाश करताहै, सो किस प्रकार इसका प्रतिकार करें। हम तो रात्रिमें देख नहीं सक्ते और दिनमें उसके दुर्गको नहीं जानते जिससे
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