भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 309

( २९४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

सुमधुर संधिंकी इच्छा करनेवाले शत्रुसेभी संधि न करे क्योंकि तत्ता पानीभी अग्निको शान्तही कर देता है ॥ २३ ॥

अपरं च स क्रूरोऽत्यन्तलुब्धो धर्मरहितः । तत् त्वया विशेषात् न सन्धेयः । उक्तञ्च यतः—

औरभी वह क्रूर अत्यन्त लोभी धर्मरहित है विशेषकर सन्धिके योग्य नहीं। कारण कहा है—

सत्यधर्मविहीनेन न सन्दध्यात्कथञ्चन । सुसन्धितोऽप्यसाधुत्वादचिराद्याति विक्रियाम् ॥ २४ ॥

सत्य धर्मसे हीनके साथ कभी सन्धि नहीं करनी चाहिये अच्छी प्रकार संधी किया हुआ असाधु होनेसे शीघ्र विकारको प्राप्त होता है ॥ २४ ॥

तस्मात् तेन सह योद्धव्यमिति मे मतिः । उक्तञ्च यतः—

इस कारण उसके साथ युद्ध करना चाहिये ऐसी मेरी मति है। कहा है कि—

क्रूरो लुब्धोऽलसोऽसत्यः प्रमादी भीरुरस्थिरः । मूढो युद्धावमन्ता च सुखोच्छेद्यो भवेद्रिपुः ॥ २५ ॥

खोटा, लोभी, आलसी, असत्यवादी, प्रमादी, डरपोक, चंचल, मूढ, युद्धमें उत्साह न करनेवाला शत्रु सुखसे नाशके योग्य होता है ॥ २५ ॥

अपरं तेन पराभूता वयम् । तद्यदि सन्धानकीर्त्तनं करिष्यामः स भूयोऽत्यन्तं कोपं करिष्यति । उक्तञ्च—

और उसने हमारा तिरस्कार किया है। सो यदि संधि होनेकी बात करेंगे तो वह फिर अत्यन्त क्रोध करेगा। कहा है—

चतुर्थोपायसाध्ये तु रिपौ सान्त्वमपक्रिया । स्वेद्यमामज्वरं प्राज्ञः कोऽम्भसा परिषिंचति ॥ २६ ॥

जो शत्रु चौथे उपाय (युद्ध) से साध्य होनेके योग्यहो उससे साम प्रयोग करना कोपवृद्धिका कारण है, पसीनेसे साध्य नवीन ज्वरको कौन बुद्धिमान् जलसे सींचता है ? ॥ २६ ॥

सामवादाः सकोपस्य शत्रोः प्रत्युत दीपकाः । प्रतप्तस्येव सहसा सर्पिषस्तोयबिन्दवः ॥ २७ ॥

क्रोधित शत्रुसे साम वचन कहना उसके क्रोधका बढाना है, और तप्ते घृतमें एक साथ जल बिन्दु डालनेकी समान है ॥ २७ ॥