भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम्। (२९५)

यदेव एतद्वदति रिपुर्बलवान् तदप्यकारणम्। उक्तञ्च यतः- जो ऐसा है यह कहते हैं कि शत्रु बलवान् है यहभी अकारण है। कहा है कि-

सोत्साहशक्तिसम्पन्नो हन्याच्छत्रुं लघुर्गुरुम् । यथा कण्ठीरवो नागे सुसाम्राज्यं प्रपद्यते ॥ २८ ॥

उत्साह शक्तिसे सम्पन्न क्षुद्र मनुष्यभी बडे शत्रुको मार सकता है, जैसे छोटे देहवाला सिंह बडे देहवाले हाथीपर स्वामित्व कर लेता है ॥ २८ ॥

मायया शत्रवो वध्या अवध्याः स्युर्बलेन ये । यथा स्त्रीरूपमास्थाय हतो भीमेन कीचकः ॥ २९ ॥

जो शत्रु बलसे अवध्यहो तो मायासे उनको वशमें करे जैसे स्त्रीरूप धारण कर भीमसेनने कीचकको मारा ॥ २९ ॥

तथाच-
तैसेही-

मृत्योरिवोग्रदण्डस्य राज्ञो यान्ति वशं द्विषः । शष्पतुल्यं हि मन्यन्ते दयालुं रिपवो नृपम् ॥ ३० ॥

मृत्युकी समान उग्रदण्डवाले राजाके वशमें शत्रु होजाते हैं और दयालु राजाको शत्रु तृणकी समान मानते हैं ॥ ३० ॥

न याति शमनं यस्य तेजस्तेजस्वितेजसा । वृथा जातेन किं तेन मातुर्यौवनहारिणा ॥ ३१ ॥

जिसके तेजस्वी तेजसे तेजशत्रुका तेज शान्त नहीं होजाता है उस माताके यौवन हरनेवालेको वृथा उत्पन्न होनेसे क्या लाभ है? ॥ ३१ ॥

या लक्ष्मीनार्वनुलिप्तांगी वैरीशोणितकुंकुमैः । कान्तापि मनसः प्रीतिं न सा धत्ते मनस्विनाम् ॥ ३२ ॥

जो लक्ष्मी शत्रुओंके रुधिररूपी कुमकुमसे अनुलिप्त अंगवाली नहीं है वह मनोहर होकरभी वीरोंके मनको आनंद नहीं देती ॥ ३२ ॥

रिपुरक्तेन संसिक्तारिस्त्रीनेत्राम्बुभिस्तथा । न भूमिर्यस्य भूपस्य का श्लाघा तस्य जीवने ॥ ३३ ॥"

शत्रुके रुधिरसे तथा शत्रुओंकी स्त्रियोंके नेत्रोंके जलसे जिस राजाकी भूमि नहीं सींची गई उसके जीनेसे क्या श्लाघा है ॥ ३३ ॥"