भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( २९६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

एवं सञ्जीवी विग्रहमन्त्रं विज्ञापयामास । अथ तच्छ्रुत्वा अनुजीविनमपृच्छत्-“भद्र ! त्वमपि स्वाभिप्रायं निवेदय” । सोऽब्रवीत्-“देव ! दुष्टः स बलाधिको निर्मर्यादश्च तत् तेन सह सन्धिविग्रहौ न युक्तौ केवलं यानमर्हं स्यातामुक्तञ्च-

इस प्रकार संजीवीने विग्रह मंत्रकी सम्मति कही । यह सुन (उसने) अनुजीवीसे पूछा ! “भद्र ! तुमभी अपने अभिप्रायको कहो” । वह बोला-“देव ! वह दुष्ट अधिक बली और मर्यादा रहित है । उसके साथ संधि विग्रह युक्त नहीं केवल यानही योग्य है । कहा है-

बलोत्कटेन दुष्टेन मर्यादारहितेन च ।
न सन्धिविग्रहौ नैव विना यानं प्रशस्यते ॥ ३४ ॥

बलसे उत्कट, दुष्ट मर्यादा रहित शत्रुसे यानके बिना संधि विग्रह पूजित नहीं है ॥ ३४ ॥

द्विधाकारं भवेद्यानं भयत्रस्तपरक्षणम् ।
एकमन्यज्जिगीषोश्च यात्रालक्षणमुच्यते ॥ ३५ ॥

दो प्रकारका यान होता है एक तो भयसे व्याकुल हुएकी रक्षा करनी दूसरे जीतनेकी इच्छा करनेवालेको शत्रुके प्रति यात्रा करनी ॥ ३५ ॥

कार्त्तिके वाथ चैत्रे वा विजिगीषोः प्रशस्यते ।
यानमुत्कृष्टवीर्य्यस्य शत्रुदेशे न चान्यदा ॥ ३६ ॥

कार्त्तिक अथवा चैत्रमें जीतनेवालेको यात्रा करनी श्रेष्ठ है बलवान्‌कोही शत्रुके देशमें गमन करना उचित है अन्यथा नहीं ॥ ३६ ॥

अवस्कन्दप्रदानस्य सर्वे कालाः प्रकीर्त्तिताः ।
व्यसने वर्त्तमानस्य शत्रोश्छिद्रान्वितस्य च ॥ ३७ ॥

व्यसनमें प्राप्त हुए और छिद्रताको प्राप्त हुए शत्रुपर आक्रमण करनेके सम्पूर्ण काल कहे हैं ॥ ३७ ॥

स्वस्थानं सुदृढं कृत्वा शूरैश्चाप्तैर्महाबलैः ।
परदेशं ततो गच्छेत्प्रणिधिव्याप्तमग्रतः ॥ ३८ ॥

अपने स्थानको विश्वस्त शूर महाबलियोंसे दृढ करके आगे दूतोंको करके परदेशको गमन करे ॥ ३८ ॥