भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( १६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

नदीके किनारे उत्पन्न हुए उस तृणका भी जन्म सफल है, जो जलमें डूबनेसे बबडाये हुए मनुष्योका अवलम्बन होता है ॥ २९ ॥

तथाच-
और देखो-

स्तिमितोन्नतसञ्चारा जनसन्तापहारिणः ।
जायन्ते विरला लोके जलदा इव सज्जनाः ॥ ३० ॥

ऊँचे नीचे संचरण करनेवाले जनके सन्ताप हरनेवाले मेघकी समान कोई सज्जन विरलेही होते है ॥ ३० ॥

निरतिशयं गरिमाणं तेन जनन्याः स्मरन्ति विद्वांसः ।
यत्कमपि वहति गर्भं महतामपि यो गुरुर्भवति ॥ ३१ ॥

विद्वान् लोग उसके जन्मसे माताकी अधिक भारता स्मरण करते है कि,उसने इसको किस प्रकार धारण किया है, जो बडे पुरुषोंको भी भारी होता है ॥ ३१॥

अप्रकटीकृतशक्तिः शक्तोऽपि जनस्तिरस्क्रिंयां लभते ।
निवसन्नन्तर्दारुणि लंघ्यो वह्निर्न तु ज्वलितः ॥ ३२ ॥”

शक्ति न प्रगट करनेवाला समर्थभी जनोंसे तिरस्कृत होजाता है,काठके भीतर रहनेवाली अग्निको सब कोई उलंघन करता है, न जलती हुई को ॥ ३२ ॥

करटक आह-
करटक बोला-

“आवां तावदप्रधानौ तत्किमावयोरनेन व्यापारेण । उक्तञ्च-

“हम तो यहां अप्रधानहैं,सो हमे इस वार्तासे क्या प्रयोजनहै । कहा भी है-

अपृष्टोऽत्राप्रधानो यो ब्रूते राज्ञः पुरः कुधीः ।
न केवलमसंमानं लभते च विडम्बनम् ॥ ३३ ॥

बिना पूछे जो अप्रधान कुबुद्धि इस संसारमें राजाके आगे बोलता है, वह केवल असम्मानकोही प्राप्त नहीं होता किन्तु अवमानताकोभी प्राप्त होता है ॥३३॥

तथाच-
और भी-

वचस्तत्र प्रयोक्तव्यं यत्रोक्तं लभते फलम् ।
स्थायीभवति चात्यन्तं रागः शुक्लपटे यथा ॥ ३४ ॥”