भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । (१७)

वचन वहां कहना चाहिये, जहां कुछ कहनेका फल हो जैसे कि, सफेद वस्त्रपर रंग अत्यन्त स्थायी होता है ॥ ३४ ॥"

दमनक आह—"मा मा एवं वद ।

दमनक बोला—"ऐसे मत कहो ।

अप्रधानः प्रधानः स्यात्सेवते यदि पार्थिवम् ।
प्रधानोऽप्यप्रधानः स्याद्यदि सेवाविवर्जितः ॥ ३५ ॥

यदि राजाको सेवनकरे तो अप्रधानभी प्रधान होजाता है और सेवासे वर्जित हो तो प्रधानभी अप्रधान होजाता है ॥ ३५ ॥

यत उक्तञ्च—
कारण कहाभी है—

आसन्नमेव नृपतिर्भजते मनुष्यं
विद्याविहीनमकुलीनमसंस्कृतं वा ।
प्रायेण भूमिपतयः प्रमदा लताश्च
यत्पार्श्वतो भवति तत्परिवेष्टयन्ति ॥ ३६ ॥

राजा निकटकेही मनुष्यको भजतेहैं, चाहे वह विद्याहीन, अकुलीन, सस्कार-हीन हो, प्रायः राजा, स्त्री और वेल जो निकट होताहै उसीको वेष्टन करते हैं ३६

तथाच—
और भी—

कोपप्रसादवस्तूनि ये विचिन्वन्ति सेवकाः ।
आरोहन्ति शनैः पश्चाद्दुन्वन्तमपि पार्थिवम् ॥ ३७ ॥

जो सेवक क्रोध और प्रसन्नताके विषयको खोजते रहतेहैं, वे-क्रमसे विरक्त [जाकोभी प्राप्त होते हैं ॥ ३७ ॥

विद्यावतां महेच्छानां शिल्पविक्रमशालिनाम् ।
सेवावृत्तिविदाञ्चैव नाश्रयः पार्थिवं विना ॥ ३८ ॥

विद्यायुक्त, कारीगर और विक्रमसे सम्पन्न, सेवावृत्तिके जाननेवाले महाशयोंको राजाके बिना अन्य आश्रय नहीं है ॥ ३८ ॥