भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 315

( ३०० ) पञ्चतन्त्रम् ।

महान् इकला वृक्ष बलवान् और प्रतिष्ठित हो उसको भी बलसे वायु सहसा घर्षण कर सकती है ॥ ५२ ॥

अथ ये संहता वृक्षाः सर्वतः सुप्रतिष्ठिताः ।
न ते शीघ्रेण वातेन हन्यन्ते ह्येकसंश्रयात् ॥ ५३ ॥

और जो मिले हुए वृक्ष सब ओरसे प्रतिष्ठित हैं उन्हें इकट्ठे होनेसे एक साथ वायु प्रहार नहीं कर सकती ॥ ५३ ॥

एवं मनुष्यमेकं च शौर्येणापि समन्वितम् ।
शक्यं द्विषन्तो मन्यन्ते हिंसन्ति च ततः परम् ॥ ५४ ॥

इसी प्रकार शूरतासे युक्त इकले मनुष्यको शत्रु तिरस्कारके योग्य मानते हैं और उसका वधभी करलेते हैं ॥ ५४ ॥

एवं प्रजीविमन्त्र इदमासनसंज्ञकम्” । एतसमाकर्ण्य चिरञ्जीविनं प्राह,–“भद्र ! त्वमपि स्वाभिप्रायं वद?” । सोऽब्रवीत्–“देव ! षाड्गुण्यमध्ये मम संश्रयः सम्यक् प्रतिभाति । तत् तस्य अनुष्ठानं कार्य्यम् । उक्तञ्च–

इस प्रकार प्रजीवीका यह मंत्र आसनसंज्ञक है”। यह सुनकर वह चिरंजीवीसे बोला,–“भद्र ! तुम भी अपना अभिप्राय कहो”। वह बोला,–“देव ! ( सन्धी आदि ) छः गुणोंके बीचमें मुझे ( १ ) संश्रयही भला विदित होता है । सो उसकाही अनुष्ठान करना चाहिये । कहा है–

असहायः समर्थोऽपि तेजस्वी किं करिष्यति ।
निर्वाते ज्वलितो वह्निः स्वयमेव प्रशाम्यति ॥ ५५ ॥

समर्थ तेजस्वी यदि असहाय हो तो क्या कर सकता है वातरहित स्थानमें प्रज्वलित अग्नि आपही शान्त हो जायगी ॥ ५५ ॥

सङ्गतिः श्रेयसी पुंसां स्वपक्षे च विशेषतः ।
तुषैरपि परिभ्रष्टा न प्ररोहन्ति तण्डुलाः ॥ ५६ ॥

पुरुषोंको अपने पक्षकी संगति करनी विशेष कर कल्याणकारक है भूसेसे रहित हुए चावल उगनेको समर्थ नहीं होते ॥ ५६ ॥


१ बलवानसे अभियुक्त हो प्रवलको आश्रय करना ।