भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 320

भाषाटीकासमेतम् । ( ३०५ )

तीर्थशब्देन अयुक्तकर्माभिधीयते तद्यदि तेषां कुत्सितं भवति तत्स्वामिनोऽभिघाताय भवति । प्रधानं भवति तद्वृद्धये स्यादिति । तद्यथा-मन्त्री पुरोहितः सेनापतिर्युवराजो दौवारिकोऽन्तर्वासिकः प्रशासकः समाहर्तृसन्निधातृप्रदेष्टृज्ञापकाः साधनाध्यक्षो गजाध्यक्षः कोशाध्यक्षो दुर्गपालकरपालसीमापालप्रोत्कटभृत्याः एषां भेदेन द्राक् रिपुः साध्यते स्वपक्षे च देवी जननी कंचुकी मालिकः शय्यापालकः स्पर्शाध्यक्षः सांवत्सरीको भिषग्जलवाहकः ताम्बूलवाहकः आचार्योऽङ्गरक्षकः स्थानचिन्तकः छत्रधरो विलासिनी एषां वैरद्वारेण स्वपक्षे विघातः । तथा च-

तीर्थशब्दसे शत्रुके जय करनेका उपायस्वरूप कर्म जानना । सो यदि यह कर्म उनका कुत्सितहो तो स्वामीके नाशके निमित्त होताहै । प्रधान हो तो उसकी वृद्धिके निमित्त होता है । सो जैसे मन्त्री, पुरोहित, सेनापति, युवराज, द्वारपाल, अन्त पुरचारी, शासनकर्ता, करसंग्रहकर्ता, सदा निकटवर्ती, प्रदेष्टा ( प्रदर्शक ), ज्ञापक ( सम्वादलेजानेवाला ), साधनाध्यक्ष ( सेनापति ), गजाध्यक्ष, खजांची, दुर्गरक्षक, कररक्षक, सीमापालक, प्रबल कर्मचारी इनके भेदसे शीघ्रही शत्रु वशीभूत होजाताहै। और अपने पक्षमें रानी, माता, कंचुकी, अन्त.पुरचारी वृद्ध, ( विप्रगुणोंसे युक्त ), मालाकार, सेजकी रक्षाकरनेवाला, स्पर्शाध्यक्ष ( सुगन्धि-लगानेवाला ), ज्योतिषी, वैद्य, पनिहारा, ताम्बूलदाता, गुरु, शरीररक्षक, स्थानके सद् असद्का ज्ञाता, छत्रधारण करनेवाला, वेश्या इनके वैरविरोधसे निजपक्षका घात होताहै । तथाच-

वैद्यसांवत्सरिकाचार्याः स्वपक्षेऽधिकृताश्चराः ।
यथाहितुण्डिकोन्मत्तः सर्वं जानन्ति शत्रुबु ॥ ६८ ॥

वैद्य, ज्योतिषी, गुरु, अपने पक्षके अधिकारी चर, आहितुण्डिकसे उन्मत्त विप्रवैद्य गूढचारी शत्रु‌का सब भेद जानते हैं ॥ ६८ ॥

तथाच-
तैसेही-

२०