भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 321, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 321

( ३०६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

कृत्याकृत्यविदस्तीर्थेष्वन्तःप्रणिधयः पदम् । विदांकुर्वन्तु महतस्तलं विद्विषदम्भसः ॥ ६९ ॥”

कार्यके जाननेवाले गूढचर उक्त मंत्रादि अठारह स्थानोंमें अन्तर पदकरके महान् शत्रुरूपी जलके तलको जाने ॥ ६९ ॥”

एवं मन्त्रिवाक्यमाकर्ण्य अत्रान्तरे मेघवर्ण आह,—“तात ! अथ किं निमित्तमेवंविधं प्राणान्तिकं सदैव वायसोलूकानां वैरम् ?” । स आह,—“वत्स ! कदाचित् हंसशुकवककोकि-लचातकोलूकमयूरकपोतपारावतविष्किरप्रभृतयः सर्वेऽपि पक्षिणः समेत्य सोद्वेगं मन्त्रयितुमारब्धाः । “अहो ! अस्माकं तावद्वैनतेयो राजा—स च वासुदेवभक्तः न कामपि चिन्तामस्माकं करोति । तद् किं तेन वृथा स्वामिना यो लुब्धकपाशैः नित्यं निबध्यमानानां न रक्षां विधत्ते । उक्तञ्च—

इसप्रकार मंत्रि के वाक्यको सुनकर इसी समय मेघवर्ण बोला,—“तात ! किस निमित्त इसप्रकार प्राणहारी सदाका वायस उलूकोंका वैर है ?” वह बोला,—“वत्स ! एक समय हंस, तोत, बगले, कोकिल, चातक, उलूक, मयूर, कपोत, पारावत, विष्किर ( चिड़िया ), आदि सब पक्षी मिलकर उद्वेग सहित सम्मति करने लगे “अहो ! हमारे गरुड़ राजा हैं, वह वासुदेवके भक्त हैं हमारी कुछभी चिन्ता नहीं करते हैं, सो उस वृथा स्वामीसे क्या है जो लुब्धकोंके जालसे नित्य बंधेहुए हमारी रक्षा नहीं करते । कहाहै—

यो न रक्षति वित्रस्तान्पीड्यमानानपरैः सदा । जन्तून्पार्थिवरूपेण स कृतान्तो न संशयः ॥ ७० ॥

जो शत्रुसे पीडित हुए भृत्योंकी रक्षा नहीं करता है तथा भयभीत जनोंकी जो रक्षा नहीं करता इसमें सन्देह नहीं वह राजा कालरूपहै ॥ ७० ॥

यदि न स्यान्नरपतिः सम्यङ्नेता ततः प्रजाः । अकर्णधारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव ॥ ७१ ॥

जो राजा भलीप्रकार शिक्षाकरनेवाला न हो तो प्रजा बिना मल्लाहके सागरमें नावकी समान पीडित होती है ॥ ७१ ॥