पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ३११ )
वरा रुधिराप्लुता अन्ये हतशिशवो बाष्पापिहितलोचनाः समेत्य मिथो मन्त्रं चक्रुः । "अहो ! विनष्टा वयम्, नित्यमेव एतद्गजयूथमागमिष्यति यतो नान्यत्र जलमस्ति । तत् सर्वेषां नाशो भविष्यति । उक्तञ्च-
किसी एक वनमें चतुर्दन्त नामक महागज़ यूथाधिपति रहताथा । वहा कभी बड़ी अनावृष्टि कितने वर्षोंतक रही । उससे तडाग, ह्रद छोटे सरोवर सूख-गये । तब उन सम्पूर्ण हाथियोंने उस गजराजसे कहा- "देव ! प्याससे व्याकुल हाथियोंके बच्चे मृतवत् हो गये हैं और कुछ मरगये हैं । सो कोई जलाशय खोजा जहा जल पानकर स्वस्थताको प्राप्त हो जाय । तब चिरकालतक ध्यान-कर उसने कहा- "है एक महान् ह्रद एकान्त स्थानमें स्थलके मध्यदेशमें पाताल-गंगाके जलसे सदा पूर्ण रहताहै सो वहा चलो" ऐसा करने पर पाच रातमें उस सरोवरमे प्राप्तहुए । वहा स्वेच्छासे जलमें अवगाहन कर सन्ध्यासमय उसमेंसे निकले । उस ह्रदके चारो ओर शशकोके असंख्य बिल कोमल भूमिमें स्थितहैं । वे संपूर्ण इधर उधर घूमते हुए भग्न होगये बहुतसे खरगोश भग्नपाद शिर गर्दनवाले होगये कोई मरगये कोई जीवनशेषवाले होगये । तब उस गजयूथके जानेमें खरगोश उद्वेगयुक्त हाथीके पैरोंसे दलित संश्रयवाले कोई भग्नचरण कोई जर्जरित शरीरवाले रुधिरसे व्याप्त कोई बालकोके मरनेसे नेत्रोंमे आंसूभरे मिल-कर परस्पर सम्मति करने लगे । "अहो ! हम नष्ट हुए जो नित्यही यह गज-समूह यहा आवैगा क्योंकि और जगह जल नहींहै । कहाहै-
स्पृशन्नपि गजो हन्ति जिघ्रन्नपि भुजङ्गमः ।
हसन्नपि नृपो हन्ति मानयन्नपि दुर्जनः ॥ ८१ ॥
हाथी स्पर्श करते ही मारता है, सर्प सूंघतेही मारता है, हँसतेही राजा मारता है मान करतेही दुर्जन मारता है ॥ ८१ ॥
तच्चिन्त्यतां कश्चिदुपायः," तत्रैकः प्रोवाच- "गम्यतां देशत्यागेन, किमन्यत्, उक्तञ्च मनुना व्यासेन च-
सो कोई उपाय विचारो" उसमेंसे एक बोला,- "देशत्याग कर चले जाओ और क्या है । मनु और व्यासने कहा है-