पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ३१५ )
शशक आह,-“भो ! आगच्छ मया सह एकाकी येन दर्शयामि”। तथानुष्ठिते शशको निशासमये तं गजं ह्रदतीरे नीत्वा जलमध्ये स्थितं चन्द्रबिम्बमदर्शयत् । आह च,-भो ! एष नः स्वामी जलमध्ये समाधिस्थः तिष्ठति तत् निभृतं प्रणम्य सत्वरं व्रजेति, नोचेत् समाधिभङ्गाद्भूयोऽपि प्रभूतं कोपं करिष्यति” । अथ गजोऽपि त्रस्तमनाः तं प्रणम्य पुन-रनागमनाय प्रस्थितः । शशकाश्च तद्दिनात् आरभ्य सपरि-वाराः सुखेन स्वेषु स्थानेषु तिष्ठन्ति स्म । अतोऽहंब्रवीमि-
यह सुनकर वह बोला,-“भो शशक ! सो भगवान् चन्द्रमाका संन्देशा कहो जिससे शीघ्र किया जाय”। वह बोला,-“आपने कल दिन यूथके सहित आकर बहुतसे खरगोश मार दिये, सो आप क्या नहीं जानते कि, यह मेरा परिग्रह है?। सो यदि जीवनसे तुम्हारा प्रयोजन है तो फिर इस ह्रदमें न आना यही सन्देशा है”। हाथी बोला,-“अब स्वामी चन्द्रमा कहां है”। वह बोला,-“इसी ह्रदमें इस समय तुम्हारे यूथसे मथित हुए खरगोशोंके जो मरनेसे शेष रहे हैं उनको समझानेको यहां आये स्थित हैं। और मुझे तुम्हारे निकट भेजा है”। गज बोला;-"जो ऐसाहै तो मुझे उन स्वामीको दिखाओ जिससे प्रणाम कर मैं अन्यत्र जाऊं"। खरगोश बोला-“भो ! मेरे साथ इकले आइये जिससे मैं दिखाऊं” तैसा करने-पर खरगोश रात्रिके समय उस यूथपतिकू ह्रदके निकट लेजाकर जलमें चन्द्र-विम्बको दिखाता हुआ । और बोलाभी-“भो ! यह हमारा स्वामी जलके मध्य समाधिमें स्थित है सो एकान्तमें प्रणाम कर शीघ्र जाओ । नहीं तो समाधिके भंगसे फिर बडा क्रोध करेगा” । तब हाथी व्याकुल मनसे उसे प्रणाम कर चला गया । खरगोश उस दिनसे लेकर परिवारसहित सुखसे अपने स्थानोंमें रहने लगे, इससे मैं कहता हू कि-
व्यपदेशेन महतां सिद्धिः सञ्जायते परा ।
शशिनो व्यपदेशेन वसन्ति शशकाः सुखम् ॥ ८९ ॥
वडोंके नामसे वडी सिद्धि होती है, देखो चन्द्रमाके नामसे खरगोश सुखसे रहने लगे ॥ ८९ ॥