भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

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( ३२० ) पञ्चतन्त्रम् ।

धान्योंमें तुच्छ धान्य जैसे पक्षियोंमें पुत्तिका (क्षुद्र) पक्षि जैसे मरण धर्मियोंमें मशक जैसे हैं इसी प्रकार जो मनुष्य धर्मका प्रमाण करके व्यवहार नहीं करते हैं वे हैं ॥ ९९ ॥

श्रेयः पुष्पं फलं वृक्षाद्दध्नः श्रेयो घृतं स्मृतम् । श्रेयस्तैलञ्च पिण्याकाच्छ्रेयान्धर्मस्तु मानुषात् ॥ १०० ॥

वृक्षसे पुष्प फल श्रेष्ठ है दहीसे घृत अच्छा है तिलचूर्णसे तैल अच्छा है मनुष्यसे धर्म अच्छा है ॥ १०० ॥

सृष्टा मूत्रपुरीषार्थमाहाराय च केवलम् । धर्महीनाः परार्थाय पुरुषाः पशवो यथा ॥ १०१ ॥

जिस प्रकार केवल मूत्र पुरीष करने और भोजन करनेवालेपर प्रयोजनके लिये विधाताने पशु बनाये हैं इसी प्रकार धर्महीन पुरुष हैं ॥ १०१ ॥

स्थैर्य्यं सर्वेषु कृत्येषु शंसन्ति नयपण्डिताः । बह्वन्तराययुक्तस्य धर्मस्य त्वरिता गतिः ॥ १०२ ॥

राजनीतिके पंडित सब कार्योंमें स्थिरताकी प्रशंसा करते हैं बहुत विघ्नोंसे युक्त धर्मकी बडी शीघ्र गति है (अर्थात् धर्मका शीघ्रही अनुष्ठान करना चाहिये) ॥ १०२ ॥

संक्षेपात्कथ्यते धर्मो जनाः किं विस्तरेण वः । परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥ १०३ ॥

हे मनुष्यो ! तुमसे संक्षेपमें धर्म कहते हैं विस्तारसे क्या है परोपकार पुण्य के निमित्त है । और दूसरेको पीडा देनी पापके निमित्त है ॥ १०३ ॥

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम् । आत्मनः प्रतिकुलानि परेषां न समाचरेत् ॥ १०४ ॥

धर्मका सर्वस्व सुनकर मनमें उसको धारण करो अपने और दूसरोके क्लेश कर काम नकरे ॥ १०४ ॥

अथ तस्य तां धर्मोपदेशनां श्रुत्वा शशक आह,—"भो भो कपिञ्जल ! एष नदीतीरे तपस्वी धर्मवादी तिष्ठति। तदेनं पृच्छावः" । कपिञ्जल आह,—"ननु स्वभावतोऽस्माकं शत्रुभू-तोऽयमस्ति । तद्दूरे स्थितौ पृच्छावः । कदाचिदस्य व्रतवैकल्यं