पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (३१९)
सो यह घर मेरा है तेरा नहीं”। कपिंजल बोला-“भो ! यदि स्मृति प्रमाण करता है, तो मेरे साथ आयो जो स्मृति पाठकसे पूछकर वह जिसको दे वह उससे ग्रहण करे । ऐसा अनुष्ठान करनेपर मैंने भी विचार किया “इसमें क्या होगा । मैंभी यह न्याय देखूंगा”। सो कौतुकसे मैंभी उनके पीछे चला । इसी समय तीक्ष्णदंष्ट्रवाला वनका बिलाव उनका विवाद सुनकर नदीके किनारे प्राप्त होकर कुशा बिछाये आंखे मीचे ऊपरको भुजा किये आधे चरणसे पृथ्वीको छूटे हुए सूर्यकी ओर मुख किये इस धर्मकी वार्ताको करताथा “अहो ! यह संसार असार है । प्राण क्षणभंगुर हैं । प्रियसमागम स्वप्नकी समान है । इन्द्र जालकी (मायावत) यह कुटुम्बका परिग्रह है । सो धर्मको छोडकर और गति नहीं है । कहा है-
अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः । नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्त्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥ ९६ ॥
शरीर अनित्य है ऐश्वर्य भी सदा नहीं रहेंगे मृत्यु सदैव निकट स्थित है इस कारण धर्मका संग्रह करना चाहिये ॥ ९६ ॥
यस्य धर्मविहीनानि दिनान्ययान्ति यान्ति च । स लोहकारभस्त्रेव श्वसन्नपि न जीवति ॥ ९७ ॥
धर्मके विना जिसके दिन आते जाते हैं वह लुहारकी धौंकनीकी समान श्वासलेता हुआभी नहीं जीता है ॥ ९७ ॥
आच्छादयति कौपीनं यो दंशमशकापहम् । शुनः पुच्छमिव व्यर्थं पाण्डित्यं धर्मवर्जितम् ॥ ९८ ॥
जो मनुष्य [इन्द्रिय दमन न कर केवल] दंश मशक निवारणकेलिये कौपीनका आवरण करते हैं उनका कुत्तेकी पूंछकी समान धर्मवर्जित पाण्डित्य वृथा है ॥ ९८ ॥
अन्यच्च- औरभी-
पुलका इव धान्येषु पूतिका इव पक्षिषु । मशका इव मर्त्येषु येषां धर्मो न कारणम् ॥ ९९ ॥