पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ३२९ )
“कि-बहुत बुद्धिसे युक्त, विज्ञानवाले, वलसे उत्कट शत्रुके वञ्चन करनेमें समर्थ होजाते हैं जैसे ब्राह्मणसे छाग लेलिया ॥ १२१ ॥”
अथवा साधु इदमुच्यते-
अथवा यह साधु कहाहै कि-
अभिनवसेवकविनयैः प्राघूर्णकोकैर्विलासिनीरुदितैः ।
धूर्त्तजनवचननिकरैरिह कश्चिदवञ्चितो नास्ति ॥ १२२ ॥
नये सेवकोंकी विनयसे, आगन्तुकके वचनोंसे, स्त्री जनोंके रोनेसे, धूर्त जनोंके वाक् प्रपञ्चसे इस जगतमें कौन नहीं वचित हुआ है ॥ १२२ ॥
किञ्च, दुर्बलैः अपि बहुभिः सह विरोधो न युक्तः। उक्तञ्च-
किंच बहुत दुर्बलोंके साथभी विरोध करना उचित नहीं है। कहाहै-
बहवो न विरोद्धव्या दुर्जया हि महाजनाः ।
स्फुरन्तमपि नागेन्द्रं भक्षयन्ति पिपीलिकाः ॥ १२३ ॥”
कि बहुतोंके साथ विरोध नहीं करना चाहिये महाजन दुर्जय होते हैं क्यों कि चींटी तेजस्वी सर्पकोभी भक्षण करगई ॥ १२३ ॥”
मेघवर्ण आह-“कथमेतत् ?” स्थिरजीवी कथयति-
मेघवर्ण बोला-“यह कैसे ?” स्थिरजीवी कहने लगा-
कथा ४.
अस्ति कस्मिंश्चित् वल्मीके महाकायः कृष्णसर्पोऽतिदर्पो नाम । स कदाचित् बिलानुसारिमार्गमुत्सृज्य अन्येन लघुद्वारेण निष्क्रमितुमारब्धः। निष्क्रामतश्च तस्य महाकायत्वात् दैववशतश्च लघुविवरत्वाच्च शरीरे व्रणः समुत्पन्नः। अथ व्रणशोणितगन्धानुसारिणीभिः पिपीलिकाभिः सर्वतो व्याप्तो व्याकुलीकृतश्च। कति व्यापादयति कति वा ताडयति। अथ प्रभूतत्वात् विस्तारितबहुव्रणः क्षतसर्वाङ्गोऽतिदर्पः पञ्चत्वमुपागतः। अतोऽहं ब्रवीमि-
किसी वल्मीकमें महा कायावाला काला साप अतिदर्प नामवाला है। वह एक समय बिलानुसारी मार्गको छोड़कर और लघुद्वारसे निकलनेलगा। निकलते