भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( २० ) पंचतन्त्रम् ।

नीतिशास्त्र पढते हुए जो सुना है, वह सेवाधर्मका सारभूत हृदयमें स्थापन कर- लिया है उसे सुनो-

सुवर्णपुष्पितां पृथ्वीं विचिन्वन्ति नरास्त्रयः ।
शूरश्च कृतविद्यश्च यश्च जानाति सेवितुम् ॥ ४६ ॥

विक्रमी, विद्वान् और सेवक सुवर्णके पुष्पवाली पृथ्वीको खोज करतेहैं ( प्राप्त करते हैं ) ॥ ४६ ॥

सा सेवा या प्रभुहिता ग्राह्या वाक्यविशेषतः ।
आश्रयेत्पार्थिवं विद्वांस्तद्वारेणैव नान्यथा ॥ ४७ ॥

वही सेवा है, जो प्रभुका हित करनेवाली है, वह प्रभुके वाक्यसे ग्रहणकरी जाती है, विद्वान् पुरुष उस ( वाक्य ) द्वारसे राजाका आश्रय करे और उपाय नहीं है ॥ ४७ ॥

यो न वेत्ति गुणान्यस्य न तं सेवेत पण्डितः ।
न हि तस्मात्फलं किंचित्सुकृष्टादूषरादिव ॥ ४८ ॥

जो जिसके गुण न जाने, विद्वान् उसकी सेवा न करै, कारण कि, उससे कुछ फल नहीं होता, जैसे ऊषर भूमिके जोतनेसे ॥ ४८ ॥

द्रव्यप्रकृतिहीनोऽपि सेव्यः सेव्यगुणान्वितः ।
भवत्याजीवनं तस्मात्फलं कालान्तरादपि ॥ ४९ ॥

धन और प्रकृतिसे हीन पुरुषभी सेवनीय गुणोंसे युक्त हो तो सेवा करनी चाहिये, उससे आजीवन और कालान्तरसे फलकी प्राप्तिभी होसकती है ॥ ४९ ॥

अपि स्थाणुवदासीनः शुष्यन्परिगतः क्षुधा ।
न त्वेवानात्मसम्पन्नाद्वृत्तिमीहेत पण्डितः ॥ ५० ॥

ठूंठकी समान स्थित हुआ सूखता हुआ महाभूखसे स्थित रहना ( अच्छा ) है परन्तु चतुर पुरुष ज्ञानशून्य प्रभुसे वृत्तिप्राप्त होनेकी इच्छ न करै ॥ ५० ॥

सेवकः स्वामिनं द्वेष्टि कृपणं परुषाक्षरम् ।
आत्मानं किं स न द्वेष्टि सेव्यासेव्यं न वेत्ति यः ॥ ५१ ॥

सेवक कृपण स्वामीको कठिन अक्षरोंसे निन्दा करताहै, परन्तु वह अपनी निन्दा क्यों नहीं करता, वह जो सेव्य और असेव्यको नहीं जानता है, ( कारण कि यह कृपण है वा नहीं पहले ही वह विचार कर स्वामीकी सेवा करै ) ५१॥