भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । (१९)

"फिर आपकी क्या करनेकी इच्छा है ?" वह बोला-“आज हमारा स्वामी पिंगलक डरेकुटुम्बसहित भीत स्थितहै सो इसके निकट जाय डरके कारणको जान सन्धि ( मेल ) विग्रह ( युद्ध ) यान ( शत्रुके प्रतियात्रा ) आसन ( समयका देखना) संश्रय ( बलवानसे अभियुक्त होनेके कारण सबलका आश्रय ) इनमेंसे एकका आश्रय करूंगा ।" करटक बोला-“आप कैसे जानते हैं कि, स्वामी भयभीत है?" वह बोला-“इस जाननेमें क्या है, कहा है-

उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते हयाश्च नागाश्च वहन्ति चोदिताः । अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः ॥ ४४ ॥

कहे अर्थको पशुभी ग्रहण करलेते हैं, हाथी, घोडे प्रेरितहुए ( भार ) वहन करते हैं, पण्डितजन बिनकही बातकोभी ग्रहण करतेहैं, क्योंकि पराई चेष्टाके ज्ञान होनेके फलवाली बुद्धियां होतीहैं ॥ ४४ ॥

तथाच मनुः- जैसाही मनुजीने कहाहै-

आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषणेन च । नेत्रवक्त्रविकारैश्च लक्ष्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥ ४५ ॥

आकार ( अवयव विषाद प्रसादको प्राप्त ) से सकेतसे, गमन, क्रिया, भाषण, नेत्र और मुखके विकारसे, मनके अन्तरकी बात जानी जाती है ॥ ४५ ॥

तदहैनं भयाकुलं प्राप्य स्वबुद्धिप्रभावेण निर्भयं कृत्वा वशीकृत्य च निजां साचिव्यपदवीं समासादयिष्यामि” । करटक आह-“अनभिज्ञो भवान् सेवाधर्मस्य । तत्कथमेनं वशीकरिष्यसि ?” । सोऽब्रवीत्-“कथमहं सेवानभिज्ञः। मया हि तातोत्सङ्गे क्रीडता अभ्यागतसाधूनां नीतिशास्त्रं पठतां यच्छ्रुतं सेवाधर्मस्य सारभूतं हृदि स्थापितं श्रूयतां तच्चेदम्-

सो इस भयसे व्याकुल हुएको प्राप्त होकर अपनी बुद्धिसे निर्भय कर इसको वशीभूत कर अपनी मन्त्रिीपदवीको प्राप्त हूगा"। करटक बोला-“आप सेवाधर्मसे अनभिज्ञ हो तो इसे किस प्रकारसे वशीभूत करोगे" ? । वह बोला-“मैं किस प्रकारमें सेवासे अनभिज्ञ हूं, मैने पिताकी गोदीमे खेलते हुए अभ्यागत साधुओंकी