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पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

भाषाटीकासमेतम् । (१९)

"फिर आपकी क्या करनेकी इच्छा है ?" वह बोला-“आज हमारा स्वामी पिंगलक डरेकुटुम्बसहित भीत स्थितहै सो इसके निकट जाय डरके कारणको जान सन्धि ( मेल ) विग्रह ( युद्ध ) यान ( शत्रुके प्रतियात्रा ) आसन ( समयका देखना) संश्रय ( बलवानसे अभियुक्त होनेके कारण सबलका आश्रय ) इनमेंसे एकका आश्रय करूंगा ।" करटक बोला-“आप कैसे जानते हैं कि, स्वामी भयभीत है?" वह बोला-“इस जाननेमें क्या है, कहा है-

उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते हयाश्च नागाश्च वहन्ति चोदिताः । अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः ॥ ४४ ॥

कहे अर्थको पशुभी ग्रहण करलेते हैं, हाथी, घोडे प्रेरितहुए ( भार ) वहन करते हैं, पण्डितजन बिनकही बातकोभी ग्रहण करतेहैं, क्योंकि पराई चेष्टाके ज्ञान होनेके फलवाली बुद्धियां होतीहैं ॥ ४४ ॥

तथाच मनुः- जैसाही मनुजीने कहाहै-

आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषणेन च । नेत्रवक्त्रविकारैश्च लक्ष्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥ ४५ ॥

आकार ( अवयव विषाद प्रसादको प्राप्त ) से सकेतसे, गमन, क्रिया, भाषण, नेत्र और मुखके विकारसे, मनके अन्तरकी बात जानी जाती है ॥ ४५ ॥

तदहैनं भयाकुलं प्राप्य स्वबुद्धिप्रभावेण निर्भयं कृत्वा वशीकृत्य च निजां साचिव्यपदवीं समासादयिष्यामि” । करटक आह-“अनभिज्ञो भवान् सेवाधर्मस्य । तत्कथमेनं वशीकरिष्यसि ?” । सोऽब्रवीत्-“कथमहं सेवानभिज्ञः। मया हि तातोत्सङ्गे क्रीडता अभ्यागतसाधूनां नीतिशास्त्रं पठतां यच्छ्रुतं सेवाधर्मस्य सारभूतं हृदि स्थापितं श्रूयतां तच्चेदम्-

सो इस भयसे व्याकुल हुएको प्राप्त होकर अपनी बुद्धिसे निर्भय कर इसको वशीभूत कर अपनी मन्त्रिीपदवीको प्राप्त हूगा"। करटक बोला-“आप सेवाधर्मसे अनभिज्ञ हो तो इसे किस प्रकारसे वशीभूत करोगे" ? । वह बोला-“मैं किस प्रकारमें सेवासे अनभिज्ञ हूं, मैने पिताकी गोदीमे खेलते हुए अभ्यागत साधुओंकी

( २० ) पंचतन्त्रम् ।

नीतिशास्त्र पढते हुए जो सुना है, वह सेवाधर्मका सारभूत हृदयमें स्थापन कर- लिया है उसे सुनो-

सुवर्णपुष्पितां पृथ्वीं विचिन्वन्ति नरास्त्रयः ।
शूरश्च कृतविद्यश्च यश्च जानाति सेवितुम् ॥ ४६ ॥

विक्रमी, विद्वान् और सेवक सुवर्णके पुष्पवाली पृथ्वीको खोज करतेहैं ( प्राप्त करते हैं ) ॥ ४६ ॥

सा सेवा या प्रभुहिता ग्राह्या वाक्यविशेषतः ।
आश्रयेत्पार्थिवं विद्वांस्तद्वारेणैव नान्यथा ॥ ४७ ॥

वही सेवा है, जो प्रभुका हित करनेवाली है, वह प्रभुके वाक्यसे ग्रहणकरी जाती है, विद्वान् पुरुष उस ( वाक्य ) द्वारसे राजाका आश्रय करे और उपाय नहीं है ॥ ४७ ॥

यो न वेत्ति गुणान्यस्य न तं सेवेत पण्डितः ।
न हि तस्मात्फलं किंचित्सुकृष्टादूषरादिव ॥ ४८ ॥

जो जिसके गुण न जाने, विद्वान् उसकी सेवा न करै, कारण कि, उससे कुछ फल नहीं होता, जैसे ऊषर भूमिके जोतनेसे ॥ ४८ ॥

द्रव्यप्रकृतिहीनोऽपि सेव्यः सेव्यगुणान्वितः ।
भवत्याजीवनं तस्मात्फलं कालान्तरादपि ॥ ४९ ॥

धन और प्रकृतिसे हीन पुरुषभी सेवनीय गुणोंसे युक्त हो तो सेवा करनी चाहिये, उससे आजीवन और कालान्तरसे फलकी प्राप्तिभी होसकती है ॥ ४९ ॥

अपि स्थाणुवदासीनः शुष्यन्परिगतः क्षुधा ।
न त्वेवानात्मसम्पन्नाद्वृत्तिमीहेत पण्डितः ॥ ५० ॥

ठूंठकी समान स्थित हुआ सूखता हुआ महाभूखसे स्थित रहना ( अच्छा ) है परन्तु चतुर पुरुष ज्ञानशून्य प्रभुसे वृत्तिप्राप्त होनेकी इच्छ न करै ॥ ५० ॥

सेवकः स्वामिनं द्वेष्टि कृपणं परुषाक्षरम् ।
आत्मानं किं स न द्वेष्टि सेव्यासेव्यं न वेत्ति यः ॥ ५१ ॥

सेवक कृपण स्वामीको कठिन अक्षरोंसे निन्दा करताहै, परन्तु वह अपनी निन्दा क्यों नहीं करता, वह जो सेव्य और असेव्यको नहीं जानता है, ( कारण कि यह कृपण है वा नहीं पहले ही वह विचार कर स्वामीकी सेवा करै ) ५१॥

भाषाटीकासमेतम् । (२१)

यमाश्रित्य न विश्रामं क्षुधार्त्ता यान्ति सेवकाः ।
सोऽर्कवन्नृपतिस्त्याज्यः सदा पुष्पफलोऽपि सन् ॥ ५२ ॥

जिसको प्राप्त होकर क्षुधासे व्याकुल सेवक विश्रामको प्राप्त नहीं होते हैं, वह सदा पुष्प फलयुक्तभी राजा आकके वृक्षकी समान त्यागने योग्य है ॥ ५२ ॥

राजमातरि देव्यां च कुमारे मुख्यमन्त्रिणि ।
पुरोहिते प्रतीहारे सदा वर्त्तत राजवत् ॥ ५३ ॥

राजमाता, पटरानी, कुमार, मुख्यमन्त्री, पुरोहित और द्वारपाल इनसे राजाकी समान बर्ताव करै ॥ ५३ ॥

जीवेति प्रभु प्रोक्तः कृत्याकृत्यविचक्षणः ।
करोति निर्व्विकल्पं : स भवेद्राजवल्लभः ॥ ५४ ॥

कृत्य अकृत्यका जाननेवाला पुकारनेसे जिव ऐसा कहै और विना विचारे आज्ञा सम्पादन करे वह राजाका प्रिय होताहै ॥ ५४ ॥

प्रभुप्रसादजं वित्तं सुप्राप्तं यो निवेदयेत् ।
वस्त्राद्यञ्च दधात्यङ्गे स भवेद्राजवल्लभः ॥ ५५ ॥

जो प्रभुकी प्रसन्नतासे प्राप्त हुए द्रव्यसे सन्तोष प्रकाश करे और उनके वस्त्र आदि अपने अंगमे धारण करे वह राजाका प्रिय होताहै ॥ ५५ ॥

अन्तःपुरचरैः सार्द्धं यो न मन्त्रं समाचरेत् ।
न कलत्रैर्नरेन्द्रस्य स भवेद्राजवल्लभः ॥ ५६ ॥

अन्तःपुरमे रहनेवालोंके साथ जो सलाह नहीं करता है, न राजाकी कलत्रोंसे बात करताहै, वह राजप्रिय होताहै ॥ ५६ ॥

द्यूतं यो यमदूताभं हालां हालाहलोपमाम् ।
पश्येद्दारान्वृथाकारान्स भवेद्राजवल्लभः ॥ ५७ ॥

जूएको यमदूतकी समान, सुराको विषकी समान, स्त्रियोंको कुत्सित आकारवाली देखता है, वह राजप्रिय होता है ॥ ५७ ॥

युद्धकालेऽग्रगो यः स्यात्सदा पृष्ठानुगः पुरे ।
प्रभोर्द्वाराश्रितो हर्म्ये स भवेद्राजवल्लभः ॥ ५८ ॥

जो युद्धकालमे आगे चले, पुरमे पीछे २ चले, महलमें प्रभुक द्वारे स्थित रहे वह राजाका प्रिय होता है ॥ ५८ ॥

( २२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

सम्मतोऽहं विभोर्नित्यमिति मत्वा व्यतिक्रमेत् ।
कृच्छ्रेष्वपि न मर्यादां स भवेद्राजवल्लभः ॥ ५९ ॥

मैं प्रभुका नित्य सम्मत हूं, ऐसे विचार कर जो कठिनतामें भी मर्यादाका आक्रमण नहीं करता है वह राजाका प्रिय होता है ॥ ५९ ॥

द्वेषिद्वेषपरो नित्यमिष्टानामिष्टकर्मकृत् ।
यो नरो नरनाथस्य स भवेद्राजवल्लभः ॥ ६० ॥

जो राजाके द्वेषियोंसे नित्य द्रोह करता है, प्रियजनोंका नित्य प्रिय करता है, वह राजाका प्रिय होता ॥ ६० ॥

प्रोक्तः प्रत्युत्तरं नाह विरुद्धं प्रभुणा च यः ।
न समीपे हसत्युच्चैः स भवेद्राजवल्लभः ॥ ६१ ॥

जो प्रभुके कहनेपर विरुद्ध उत्तर नहीं देता है समीपमें उच्च स्वरसे नहीं हँस-ताहै, वह राजप्रिय होता है ॥ ६१ ॥

यो रणं शरणं तद्वन्मन्यते भयवर्जितः ।
प्रवासं स्वपुरावासं स भवेद्राजवल्लभः ॥ ६२ ॥

जो भयरहित हो, युद्धको गृहवत् मानता है, परदेशको अपने नगरकी समान मानता है, वह राजवल्लभ होता है ॥ ६२ ॥

न कुर्यान्नरनाथस्य योषिद्भिः सह सङ्गतिम् ।
न निन्दां न विवादं च स भवेद्राजवल्लभः ॥ ६३ ॥”

राजाकी स्त्रियोंके साथ संगती न करे, तथा उनकी निन्दा और विवाद न करै, वह राजाका प्रिय होताहै ॥ ६३ ॥”

करटक आह— “अथ भवान् तत्र गत्वा किं तावत् प्रथमं वक्ष्यति तत् तावदुच्यताम् ?”
करटक बोला—“तो तुम प्रथम वहां जाकर क्या कहोगे, वह तो कहो ?”

दमनक आह—
दमनक बोला—

“उत्तरादुत्तरं वाक्यं वदतां सम्प्रजायते ।
सुवृष्टिगुणसम्पन्नाद्बीजाद्बीजमिवापरम् ॥ ६४ ॥

“कहनेसे वाक्य उत्तरोत्तर प्रवृत्त हो जाता है, जैसे सुवृष्टिके गुणसे बीजसे बीज होताहै ॥ ६४ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (२३)

अपायसन्दर्शनजां विपत्तिमुपायसन्दर्शनजाञ्च सिद्धिम् ।
मेधाविनो नीतिगुणप्रयुक्तां पुरःस्फुरन्तीमिव वर्णयन्ति ६५

'अपायसे प्राप्त होनेवाली विपत्ति, उपायके करनेसे सिद्धि बुद्धिमान् नीतिके गुणसे प्रयुक्त की हुई आगे स्फुरायमान होते हुएकी समान वर्णन करते हैं ॥६५॥

एकेषां वाचि शुकवदन्येषां हृदि मूकवत् ।
हृदि वाचि तथान्येषां वल्गु वलगन्ति सूक्तयः ॥ ६६ ॥

किन्हींके वचन बोलनेमे तोतेकी समान मधुर और मनमे कपट, कोई हृदयमें मूकवत् अर्थात् वाक्य तो सुननेमें कठोर और हृदय कपटशून्य, दूसरे पुरुषोंके सुवचन हृदय और वचन दोनोंसेही सारताको प्रगट करते हैं ॥ ६६ ॥

न च अहमप्राप्तकालं वक्ष्ये । आकर्णितं मया नीतिसारं पितुः पूर्वमुत्सङ्गं हि निषेवता ।

मैं असमयके वचनोको न कहूँगा, पिताकी गोदीको सेवन करते हुए पहिले मैने सुना है ।

अप्राप्तकालं वचनं बृहस्पतिरपि ब्रुवन् ।
लभते बह्ववज्ञानमपमानञ्च पुष्कलम् ॥ ६७ ॥”

अप्राप्त कालके वचनोंको बृहस्पतिभी कहै तो बहुत अवज्ञा और अपमानको प्राप्त होते हैं ॥ ६७ ॥ ”

करटक आह-
करटक बोला-

“ दुराराध्या हि राजानः पर्वता इव सर्वदा ।
व्यालाकीर्णाः सुविषमाः कठिना दुष्टसेविताः ॥ ६८ ॥

“पर्वतकी समान राजा सदा दुराराध्य हैं, जैसे कि राजा और पर्वत सर्प ( हिंस्रजन ) श्वापद जीवोसे युक्त दारुण और नीचे ऊंचे मागोंसे विषम होते हैं, इसी प्रकार राजा दुष्ट सेवित होनेसे कठिन होते हैं ॥ ६८ ॥

तथाच-
और देखो-

भोगिनः कञ्चुकाविष्टाः कुटिलाः क्रूरचेष्टिताः ।
सुदुष्टा मन्त्रसाध्याश्च राजानः पन्नगा इव ॥ ६९ ॥

( २४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

सुख भोगमें रत, फणावाले, वस्त्रधारी, केंचलीधारी, कुटिल ( कपटी ), टेढी गतिवाले, निष्ठुरचेष्टावाले, दुष्टराजा सर्पकी समान मन्त्र चित्तानुवृत्तिसेही साध्य होते हैं ॥ ६९ ॥

द्विजिह्वाः क्रूरकर्माणोऽनिष्टाश्छिद्रानुसारिणः ।
दूरतोऽपि हि पश्यन्ति राजानो भुजगा इव ॥ ७० ॥

दो जिह्वावाले, क्षण क्षणमे भिन्न बचन कहनेवाले, क्रूरकर्म करनेवाले, अनिष्ट ( निष्पत्तिरहित ) दोषके देखनेवाले, ( बिलमें गमन करनेवाले ) राजा सर्पोंकी समान दूरसेही देखते हैं ॥ ७० ॥

स्वल्पमप्यपकुर्वन्ति येऽभीष्टा हि महीपतेः ।
ते वह्नाविव दह्यन्ते पतङ्गाः पापचेतसः ॥ ७१ ॥

जो राजाके इष्टपुरुष उनका थोडाभी अनिष्ट करते हैं, वे पापचित्तवाले अग्निमें पतंगकी समान जलते हैं ॥ ७१ ॥

दुरारोहं पदं राज्ञां सर्वलोकनमस्कृतम् ।
स्वल्पेनाप्यपकारेण ब्राह्मण्यमिव दुष्यति ॥ ७२ ॥

सब लोकोंसे नमस्कार करनेके योग्य राजोंका पद दुरारोह ( कठिनसे प्राप्त ) है, थोडेसेभी अपकारसे ब्राह्मणत्वकी समान दूषित होजाता है ॥ ७२ ॥

दुराराध्याः श्रियो राज्ञां दुरापा दुष्परिग्रहाः ।
तिष्ठन्त्याप इवाधारे चिरमात्मनि संस्थिताः ॥ ७३ ॥”

राजलक्ष्मी कठिनतासे सेवनीय होसक्ती है, इसी कारण दुर्लभ और प्राप्य होनेको अशक्य है, लक्ष्मी आधार ( पात्र ) में जलकी समान यत्नसे रक्षित की हुई चिरकालतक अपने पास रहती है ॥ ७३ ॥”

' दमनक आह—" सत्यमेतत्परं किन्तु-
दमनक बोला,—" यह सत्य है किन्तु—

यस्य यस्य हि यो भावस्तेन तेन समाचरेत् ।
अनुप्रविश्य मेधावी क्षिप्रमात्मवशं नयेत् ॥ ७४ ॥

जिस जिसका जो जो भाव है; उस उस भावसे उसको सेवन करै, बुद्धिमान् उसमें प्रवेश कर शीघ्र अपने वशमे करै ॥ ७४ ॥

भर्तुश्चित्तानुवर्तित्वं सुवृत्तं चानुजीविनाम् ।
राक्षसाश्चापि गृह्यन्ते नित्यं छन्दानुवर्तिभिः ॥ ७५ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (२५)

स्वामीके चित्तके अनुसार वर्तना अनुजीवियोंका सुशील है, निरन्तर उनके आशयके अनुसार चलनेवाले मनुष्य राक्षसोंकोभी वश करलेते हैं ॥७५॥

सरुषि नृपे स्तुतिवचनं तदभिमते प्रेम तद्विषि द्वेषः ।
तद्दानस्य शंसा अमन्त्रतन्त्रं वशीकरणम् ॥ ७६ ॥ ”

राजाके क्रोधकरनेमें स्तुतिके वचन, उनके इष्टमें प्रेम, उनके द्वेषवालेसे द्वेष, उनके दानकी प्रशंसा, बिना मन्त्रके वशीकरण तन्त्र है ॥ ७६ ॥ ”

करटक आह-
करटक बोला-

“यद्येवमभिमतं तर्हि शिवास्ते पन्थानः सन्तु । यथाभिलषितम् अनुष्ठीयताम् ” । सोऽपि प्रणम्य पिङ्गलकाभिमुखं प्रतस्थे । अथ आगच्छन्तं दमनकमालोक्य पिङ्गलको द्वाःस्थमब्रवीत्-“ अपसार्यतां वेत्रलता । अयमस्माकं चिरन्तनो मन्त्रिपुत्रो दमनकोऽव्याहतप्रवेशः। तत्प्रवेश्यतां द्वितीयमण्डलभागी” इति । स आह-“यथा अवादीत् भवान्” इति । अथोपसृत्य दमनको निर्दिष्टे आसने पिङ्गलकं प्रणम्य प्राप्तानुज्ञ उपविष्टः । स तु तस्य नखकुलिशालंकृतं दक्षिणपाणिमुपरि दत्त्वा मानपुरःसरमुवाच-“अपि शिवं भवतः ? कस्माच्चिरात् दृष्टोऽसि ?” । दमनक आह-“न किञ्चिद्देवपादानाम् अस्माभिः प्रयोजनम् । परं भवतां प्राप्तकालं वक्तव्यं यत उत्तममध्यमाधमैः सर्वैरपि राज्ञां प्रयोजनम् ।

“जो यह विचारहै तौ आपके मार्ग मङ्गलकारी हों । यथेच्छ अनुष्ठान करो” । वहभी प्रणामकर पिंगलकके सन्मुख चला । तब आते हुए दमनकको देखकर पिंगलक द्वारपालसे बोला-“वेत्रलता ( दड ) अलगकरो, यह हमारा प्राचीन मन्त्रीपुत्र बेरोकटोक प्रवेशवालाहै सो आनेदो दूसरे मण्डल ( आसन ) का अधिकारी है” । वह बोला-“जो कुछ आप आज्ञा देते हैं” । तब जाकर दमनक दिये हुए आसनमें पिंगलकको प्रणाम करके बैठा । वह तो उसके नखरूपी वज्रसे अलंकृत दक्षिण हाथको ऊपर रखकर सन्मानसे बोला- “आपको मगल है ? क्यों बहुत दिनोंमें दीखे ?”दमनक बोला-“श्रीमान्के चर-

( २६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

णोंका यद्यपि हमसे कुछ प्रयोजन नहीं है परन्तु आपसे समयपर वचन कहना उचितही है, कारण कि, उत्तम, मध्यम, अधम सभीसे राजाओंका प्रयोजन होता है ।

उक्तञ्च-
कहाभी है-

दन्तस्य निष्कोषणकेन नित्यं कर्णस्य कण्डूयनकेन वापि ।
तृणेन कार्य्यं भवतीश्वराणां किमंत्र वाग्घस्तवता नरेण ७७

दांतोंके कुरेदनेसे वा नित्य कर्णोंके खजानेसे तृणसे भी राजोंका कार्य होताहै हे अङ्ग ! वाणी और हाथवाले मनुष्यसे कार्य होता है सदा तो कहनाही क्या है ॥ ७७ ॥

तथा वयं देवपादानामान्वयागता भृत्या आपत्स्वपि पृष्ठ-गामिनो यद्यपि स्वमधिकारं न लभामहे तथापि देवपादानामेतत् युक्तं न भवति ।

इसी प्रकारसे हम स्वामीके चरणोंके कुलक्रमसे प्राप्त हुये भृत्य आपदांमेंभी पीछे चलनेवाले हैं यद्यपि अपने अधिकारको प्राप्त नहीं हैं तोभी श्रीमान्‌के चरणोंको यह योग्य नहीं है ।

उक्तञ्च-
कहाभी है-

स्थानेष्वेव नियोक्तव्या भृत्याश्चाभरणानि च ।
न हि चूडामणिः पादे प्रभवामीति बध्यते ॥ ७८ ॥

भृत्य और गहने स्थानमें नियुक्त करने चाहिये । मैं प्रभुहूं ऐसा मानकर चूडामणि (शिरका भूषण) चरणपर कोई धारण नहीं करता है ॥ ७८ ॥

यतः-
कारण-

अनभिज्ञो गुणानां यो न भृत्यैरनुगम्यते ।
धनाढ्योऽपि कुलीनोऽपि क्रमायातोऽपि भूपतिः ॥ ७९ ॥

जो गुणोंसे अनभिज्ञ है; भृत्य उसको साथ नहीं देते, चाहें वह धनाढ्य कुलीन और क्रमायात राजा हो ॥ ७९ ॥

भाषाटीकासमेतम्। (२७)

उक्तञ्च-
कहा है कि-

असमैः समीयमानः समैश्च परिहीयमाणसत्कारः ।
धुरि यो न युज्यमानस्त्रिभिरेर्थपतिं त्यजति भृत्यः ॥८०॥

जो भृत्य असमान भृत्योंसे समानताको प्राप्त किया जाय तुल्य भृत्योंसे दूर सत्कारवाला किया जाय तथा कार्यभारमें नियुक्त न किया जाय इन तीन कारणोंसे भृत्य राजाको त्याग न करदेता है ॥ ८० ॥

यच्च अविवेकतया राजा भृत्यानुत्तमपदयोग्यान् हीनाधमस्थाने नियोजयति न ते तत्रैव तिष्ठन्ति न भूपतेर्दोषो न तेषाम् । उक्तञ्च-

और जो अज्ञानतासे उत्तम पदके योग्य भृत्योंको हीन अधम स्थानमें नियुक्त करता है, न वे वहा रहते है न राजाका दोष है न उनका । कहाभी है-

कनकभूषणसंग्रहणोचितो यदि मणिस्त्रपुणि प्रतिबध्यते ।
न स विरौति न चापि स शोभते भवति योजयितुर्वचनीयता ॥ ८१ ॥

सुवर्णके गहनेमे लगाने योग्य मणि यदि निकृष्ट धातुमे लगाई जाय, वह मणि न रोती है, न शोभित होती है किन्तु वैसे नियुक्त करनेवालेकी निन्दा होती है कि, लगानेवालेको योग्यायोग्यका ज्ञान नहीं है ॥ ८१ ॥

यच्च स्वामी एवं वदति "चिराद्दृश्यते" तदपि श्रूयताम् ।

सव्यदक्षिणयोर्यत्र विशेषो नास्ति हस्तयोः ।
कस्तत्र क्षणमप्यार्यो विद्यमानगतिर्वसेत् ॥ ८२ ॥

और जो स्वामी यह कहते हैं कि, "बहुत कालमें देखा" सोभी सुनो जिस स्थानमे दहिने बाये हाथका विशेष नहीं है, वहा सब स्थानमे जानेवाला कौन बुद्धिमान् क्षणमात्रभी स्थिति करेगा ॥ ८२ ॥

काचे मणिर्मणौ काचो येषां बुद्धिविकल्प्यते ।
न तेषां सन्निधौ भृत्यो नाममात्रोऽपि तिष्ठति ॥ ८३ ॥

जिनकी बुद्धि काचमे मणि मणिमें काचका विकल्प करती है उनके निकट भृत्यजन नाममात्रकोभी स्थित नहीं होते ॥ ८३ ॥

( २८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

परीक्षका यत्र न सन्ति देशे नार्घन्ति रत्नानि समुद्रजानि । आभीरदेशे किल चन्द्रकान्तं त्रिभिर्वराटैर्विपणन्ति गोपाः ८४

जिस देशमें परीक्षा करनेवाले नहीं हैं वहां समुद्रसे उत्पन्न हुए रत्नोंका मूल्य नहीं होता ह आभीर देशमें चन्द्रकान्तमणिको गोप तीन कौडींसे खरीदते हैं ८४

लोहिताख्यस्य च मणेः पद्मरागस्य चान्तरम् । यत्र नास्ति कथं तत्र क्रियते रत्नविक्रयः ॥ ८५ ॥

लोहित मणि और पद्मरागमणिको अन्तर जहां नहीं है, वहां किस प्रकार रत्नोंका विक्रय होसक्ता है ॥ ८५ ॥

निर्विशेषं यदा स्वामी समं भृत्येषु वर्त्तते । तत्रोद्यमसमर्थानामुत्साहः परिहीयते ॥ ८६ ॥

जब स्वामी सबभृत्योंमें एकसा विशेषतः रहित वर्तता है वहां उद्यममें समर्थोंका उत्साह हीन हो जाताहै ॥ ८६ ॥

न विना पार्थिवो भृत्यैर्न भृत्याः पार्थिवं विना । तेषां च व्यवहारोऽयं परस्परनिबन्धनः ॥ ८७ ॥

भृत्योंके विना राजा नहीं और न राजाके बिना भृत्य हैं, उनका यह व्यवहार पस्पर निबन्धवाला है ॥ ८७ ॥

भृत्यैर्विना स्वयं राजा लोकानुग्रहकारिभिः । मयूखैरिव दीप्तांशुस्तेजस्यपि न शोभते ॥ ८८ ॥

भृत्योंके विना राजा ऐसे शोभित नहीं होता जिस प्रकार लोककी अनुग्रह-करनेवाली किरणोंके बिना तेजस्वी सूर्य नहीं शोभित होता है ॥ ८८ ॥

अरैः सन्धाय्यन्ते नाभिर्नाभौ चाराः प्रतिष्ठिताः । स्वामिसेवकयोरेवं वृत्तिचक्रं प्रवर्त्तते ॥ ८९ ॥

अरोंमें नाभि और नाभि ( पुट्ठे ) में अरे स्थित रहते हैं, इस प्रकारसे यह स्वामी सेवकका आजीविका चक्र चलता है ॥ ८९ ॥

शिरसा विधृता नित्यं स्नेहेन परिपालिताः । केशा अपि विरज्यन्ते निःस्नेहाः किं न सेवकाः ॥ ९० ॥

नित्य शिरसे धारण किये स्नेहसे परिपालित तेलके बिना केशभी रूखे हो जाते हैं, क्या सेवक न होंगे ॥ ९० ॥

भाषाटीकासमेतम् । (२९)

राजा तुष्टो हि भृत्यानामर्थमात्रं प्रयच्छति ।
ते तु सम्मानमात्रेण प्राणैरप्युपकुर्वते ॥ ९१ ॥

राजा प्रसन्न होकर भृत्योको अर्थमात्र प्रदान करता है, और वे सन्मानमात्रसे उसके निमित्त अपने प्राण लगादेते हैं ॥ ९१ ॥

एवं ज्ञात्वा नरेन्द्रेण भृत्याः कार्या विचक्षणाः ।
कुलीनाः शौर्यसंयुक्ताः शक्ता भक्ताः क्रमागताः ॥ ९२ ॥

यह विचारकर राजाओंको चतुर भृत्य करने चाहिये, जो कुलीन शूरतासे सयुक्त समर्थ भक्त और कुलपरपरासे आये हों ॥ ९२ ॥

यः कृत्वा सुकृतं राज्ञो दुष्करं हितमुत्तमम् ।
लज्जया वक्ति नो किञ्चित्तेन राजा सहायवान् ॥ ९३ ॥

जो राजाका दुःसाध्य उत्तम हित करके लज्जासे कुछ नहीं कहता है, उससे ही राजा सहायवान् होता है ॥ ९३ ॥

यस्मिन् कृत्यं समावेश्य निर्विशङ्केन चेतसा ।
आस्यते सेवकः स स्यात्कलत्रमिव चापरम् ॥ ९४ ॥

जिसमें कार्यको निर्भय चित्तसे समर्पण करके राजा स्थित होताहै वह सेवक राजाको अन्य कलत्रकी समान पोषणीय है ॥ ९४ ॥

योऽनाहूतः समभ्येति द्वारि तिष्ठति सर्वदा ।
पृष्टः सत्यं मितं ब्रूते स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९५ ॥

जो बिनाबुलाये समीपमें स्थित रहता है सदा द्वारेही स्थित रहता है और पूछनेसे सत्य बोलता है वह राजाके भृत्य होनेके योग्य है ॥ ९५ ॥

अनादिष्टोऽपि भूपस्य दृष्ट्वा हानिकरञ्च यः ॥
यतते तस्य नाशाय स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९६ ॥

और जो राजाकी आज्ञाके बिनाभी हानिकारक वार्ताको देख उसके नाश करनेका यत्न करता है, वह राजाके भृत्य होनेके योग्य है ॥ ९६ ॥

तांडितोऽपि दुरुक्तोऽपि दण्डितोऽपि महीभुजा ।
यो न चिन्तयते पापं स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९७ ॥

जो राजासे ताडित होकर कठोर कहा जाकर दण्ड दिया जाकर भी राजाका अनिष्ट चिन्तन नहीं करताहै वह राजाका भृत्य होनेके योग्य है ॥ ९७ ॥

( ३० ) पञ्चतन्त्रम् ।

न गर्वं कुरुते माने नापमाने च तप्यते ।
स्वाकारं रक्षयेद्यस्तु स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९८ ॥

जो सन्मानमें गर्व नहीं करता, अपमानमें तापित नहीं होता है और जो अपने मानापमानके भावको रक्षित करता है वह राजाका भृत्य होनेके योग्यहै ९८

न क्षुधा पीड्यते यस्तु निद्रया न कदाचन ।
न च शीतातपाद्यैश्च स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९९ ॥

कभीभी जो निद्रा और क्षुधा शीत आदिसे पीडित नहीं होताहै वह राजाओंके भृत्य होनेके योग्य है ॥ ९९ ॥

श्रुत्वा साङ्ग्रामिकीं वार्त्तां भविष्यां स्वामिनं प्रति ।
प्रसन्नास्यो भवेद्यस्तु स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ १०० ॥

जो आगे होनेवाली स्वामीकी संग्राम वार्ताको सुनकर प्रसन्नमुख होता है वह राजाके भृत्य होनेके योग्य है ॥ १०० ॥

सीमावृद्धिं समायाति शुक्लपक्ष इवोडुराट् ।
नियोगसंस्थिते यस्मिन् स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ १०१ ॥

जिस भृत्यके नियुक्त होनेमें शुक्ल पक्षके चन्द्रमाकी समान राजाकी सीमा वृद्धिको प्राप्त होती है वही राजाओंका भृत्य होनेके योग्य है ॥ १०१ ॥

सीमा सङ्कोचमायाति वह्नौ चर्म इवाहितम् ।
स्थिते यस्मिन्स तु त्याज्यो भृत्यो राज्यं समीहता ॥ १०२ ॥

और जिसकी स्थितिमें अग्निमें चर्मकी समान सीमा संकोच भावको प्राप्त होतीहै राज्यकी इच्छा करनेवाले राजा उस भृत्यको त्यागने करे ॥ १०२ ॥

तथा शृगालोऽयमिति मन्यमानेन ममोपरि स्वामिना यदि अवज्ञा क्रियते तदपि अयुक्तम् । उक्तं च यतः-

और यह शृगाल है यदि ऐसा मानकर स्वामी मेरी अवज्ञा करें तो यहभी अनुचित है । कारण कहा भी है-

कौशेयं कृमिजं सुवर्णमुपलाहूवाप गोरोमतः
पङ्कात्तामरसं शशाङ्क उदधेरिन्दीवरं गोमयात् ।
काष्ठादग्निरहेः फणादपि मणिर्गोपित्ततो रोचना
प्राकाश्यं स्वगुणोदयेन गुणिनो गच्छन्ति किं जन्मना १०३

भाषाटीकासमेतम् । (३१)

रेशम कीडोंसे, सुवर्ण पाषाणसे, दूर्वा गौके रोमसे, कमल कीचडसे, चन्द्रमा सागरसे, इन्दीवर (कमल) गोबरसे, अग्नि काष्ठसे, मणि सर्पके फणसे, रोचन गोपित्तसे उत्पन्न होता है, गुणी अपने गुणोंके उदयसे प्रकाशित होते हैं न कि जन्मसे ॥ १०३ ॥

मूषिका गृहजातापि हन्तव्या स्वापकारिणी ।
भक्ष्यप्रदानैर्मार्जारो हितकृत्प्रार्थ्यते जनैः ॥ १०४ ॥

घरमें उत्पन्न हुई अपना अपकार करनेवाली मूषिकाभी मारने योग्य है, हितकारी बिलावको भक्ष्य दान देकरभी लानेकी मनुष्य प्रार्थना करते हैं ॥ १०४ ॥

एरण्डभिण्डार्कनलैः प्रभूतैरपि सञ्चितैः ।
दारुकृत्यं यथा नास्ति तथैवाज्ञैः प्रयोजनम् ॥ १०५ ॥

जिस प्रकार बहुतसे एरण्ड भिण्ड आक नलसे कुछ काठका प्रयोजन नहीं निकलता इसी प्रकार अज्ञोंसे प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है ॥ १०५ ॥

किं भक्तेनासमर्थेन किं शक्तेनापकारिणा ।
भक्तं शक्तं च मां राजन् नावज्ञातुं त्वमर्हसि ॥ १०६ ॥"

असमर्थ भक्त और अपकारी सामर्थ्यवान् पुरुषसे क्या है, हे राजन् ! मुझ भक्त और समर्थकी अवज्ञा करनेको आप योग्य नहीं हैं ॥ १०६ ॥"

पिंगलक आह—"भवतु एवं तावत् । असमर्थः समर्थो वा चिरन्तनः त्वमस्माकं मन्त्रिपुत्रः तद्विश्रब्धं ब्रूहि यत् किंचिद्वक्तुकामः" । दमनक आह—"देव ! विज्ञाप्यं किंचिदस्ति" । पिंगलक आह—"तन्निवेद्य अभिप्रेतम्" । सोऽब्रवीत्—

पिंगलक बोला—"हो यह समर्थ वा असमर्थ, परन्तु तुम हमारे पुराने मंत्रिपुत्र हो सो जो तेरे कहनेकी इच्छा है. निर्भय कहो" दमनक बोला—"देव ! कुछ कहना तो है." पिंगलक बोला—"अपना अभीष्टकहो" वह बोला—

"अपि स्वल्पतरं कार्य्यं यद्भवेत्पृथिवीपतेः ।
तन्न वाच्यं सभामध्ये प्रोवाचेदं बृहस्पतिः ॥ १०७ ॥

"राजाका जो अत्यन्त छोटासाभी कार्य हो वह सभामे नहीं कहना चाहिये ऐसा वृहस्पतिने कहा है ॥ १०७ ॥

( ३२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

तत् एकान्तिके मद्विज्ञाप्यमाकर्णयन्तु देवपादाः । यतः– सो एकान्तमें स्वामीके चरण मेरी विज्ञप्तिको श्रवण करें कारण कि–

षट्कर्णो भिद्यते मन्त्रश्चतुष्कर्णः स्थिरो भवेत् ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन षट्कर्णं वर्जयेत्सुधीः ॥ १०८ ॥”

छः कानमें मंत्र भेदको प्राप्त होता है, चारकर्णमें स्थिर होता है इस कारण बुद्धिमान् सब प्रकार षट्कर्णको वर्जित करें ॥ १०८ ॥ ”

अथ पिंगलकाभिप्रायज्ञा व्याघ्रद्वीपिबृकपुरःसराः सर्वेऽपि तद्वचः समाकर्ण्य संसदि तत्क्षणादेव दूरीभूताः । ततश्च दमनक आह–"उदकग्रहणार्थं प्रवृत्तस्य स्वामिनः किमिह निवृत्त्यावस्थानम्" । पिंगलक आह–(सविलक्षस्मितम् ) “न किञ्चिदपि” । सोऽब्रवीत्–“ देव ! यदि अनाख्येयं तत्तिष्ठतु । उक्तञ्च–

तब पिंगलकके अभिप्राय जाननेवाले व्याघ्र गैंडे वृक आदि सब कोई उसके वचनको श्रवण कर सभामेसे उसी समय दूर होगये । दमनक बोला–“जल ग्रहणके लिये गये हुए स्वामी क्यों लौटकर यहां स्थित हुए”। पिङ्गलकने लज्जासे कुछ हास्यके सहित कहा–“कुछ नहीं” उसने कहा–“देव ! यदि कहनेके योग्य नहीं है तो जाने दीजिये । कारण कहा है–

दारेषु किञ्चित्स्वजनेषु किञ्चिद्गोप्यं वयस्येषु सुतेषु किञ्चित् ।
युक्तं न वा युक्तमिदं विचिन्त्य वदेद्विपश्चिन्महतोऽनुरोधात्॥”

कुछ स्त्रियोंमें, कुछ स्वजनोंमें, कुछ बन्धुओंमें, कुछ पुत्रोंमें गुप्त रक्खे; परन्तु विद्वान् यह युक्त है वा नहीं ऐसा विचार कर महाकार्यके वशसे गुप्तभी कहे ॥ १०९ ॥ ”

तच्छ्रुत्वा पिंगलर्कश्चिन्तयामास । “योग्योऽयं दृश्यते । तत् कथयामि एतस्य अग्रे आत्मनोऽभिप्रायम् । उक्तञ्च–

यह सुनकर पिंगलक विचार करने लगे “यह तो योग्य ही है सो इसके आगे अपना अभिप्राय कथन करूं, क्योंकि–

सुहृदि निरन्तरचित्ते गुणवति भृत्येऽनुवर्त्तिनि कलत्रे ।
स्वामिनि सौहृदयुक्ते निवेद्य दुःखं सुखी भवति ॥ ११० ॥

भाषाटीकासमेतम् । ( ३३

निरन्तर चित्तवाले सुहृद्मे, गुणवान् भृत्यमे, अनुगामिनी स्त्रीमे, सौहार्दयुक्त स्वामीमें दुःख निवेदन कर सुखी होता है ॥ ११० ॥

भो दमनक ! शृणोषि शब्दं दूरात् महान्तम् ?''। सोऽब्रवीत—"स्वामिन् ! शृणोमि ततः किम्" ? पिंगलक आह—"भद्र ! अहमस्मात् वनात् गन्तुमिच्छामि"। दमनक आह—"कस्मात्" ? । पिंगलक आह—"यतोऽद्य अस्मद्वने किमपि अपूर्व्वं सत्त्वं प्रविष्टं यस्य अयं महाशब्दः श्रूयते । तस्य च शब्दानुरूपेण पराक्रमेण भव्यमिति"। दमनक आह—"यत् शब्दमात्रादपि भयमुपगतः स्वामी तदपि अयुक्तम् । उक्तञ्च—

भो दमनक ! क्या तू दूरसे महान् शब्द श्रवण करता है"? । वह बोला—"स्वामिन् ! सुनता हूं सो क्या"? । पिंगलक बोला—"भद्र ! मैं इस वनसे जानेकी इच्छा करता हूं"। दमनक बोला—"क्यों ?" । पिंगलक बोला—"जो कि, इस वनमे कोई अपूर्व जीव आया; जिसका यह महाशब्द सुनाई देता है । शब्दके अनुरूप इसका पराक्रम भी होगा"। दमनक बोला—"यदि स्वामीको शब्दमात्रसेभी भय प्राप्त हुवा है, सोभी युक्त नहीं है । कहा है—

अम्भसा भिद्यते सेतुस्तथा मन्त्रोऽप्यरक्षितः । पैशुन्याद्भिद्यते स्नेहो भिद्यते वाग्भिरातुरः ॥ १११ ॥

जैसे जलसे सेतु भेदको प्राप्त होता है इसी प्रकार अरक्षित मन्त्र भेदको प्राप्त होता है (दुर्जनतासे) चुगलीसे स्नेह और पंडित जन शुष्क कथासे भेदको प्राप्त होता है ॥ १११ ॥

तन्न युक्तं स्वामिनः पूर्व्वोपार्जितं वनं त्यक्तुम् । यतो भेरीवेणुबीणामृदंगतालपटहशंखकाहलादिभेदेन शब्दा अनेकविधा भवन्ति । तत् न केवलात् शब्दमात्रादपि भेतव्यम् । उक्तञ्च—

सो स्वामीको कुलक्रमागत वन त्यागना उचित नहीं है, जो कि भेरी, वेणु वीणा, मृदंग, ताल, पटह, काहलादिके भेदसे शब्द अनेक प्रकारके होते हैं, सो केवल शब्दमात्रसेही न डरना चाहिये । कहाहै—

( ३४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

अत्युत्कटे च रौद्रे च शत्रौ प्राप्ते न हीयते ।
धैर्यं यस्य महीनाथो न स याति पराभवम् ॥ ११२ ॥

जिस राजाका धैर्य अति उत्कट (दारुण) भयानक शत्रुके प्राप्त होनेसेभी नष्ट नहीं होताहै, उसका कभी पराभव नहीं होता ॥ ११२ ॥

दर्शितभयेऽपि धातरि धैर्यध्वंसो भवेन्न धीराणाम् ।
शोषितसरसि निदाघे नितरामेवोद्धतः सिन्धुः ॥ ११३ ॥

विधाताकेभी भय दिखानेसे धीरोका धैर्यध्वंस नहीं होताहै, गरमीमें सरोवर सूखते हैं, परन्तु सिन्धु अत्यन्त बढताही है ॥ ११३ ॥

तथाच–
और देखो–

यस्य न विपदि विषादः सम्पदि हर्षो रणे न भीरुत्वम् ।
तं भुवनत्रयतिलकं जनयति जननी सुतं विरलम् ॥ ११४ ॥

जिसको विपत्तिमें विषाद, सम्पत्तिमें हर्ष और रणमें भय नहीं होताहै, उस त्रिभुवनके तिलक किसी विरलेही पुत्रको माता उत्पन्न करती है ॥ ११४ ॥

तथाच–
औरभी–

शक्तिवैकल्यनम्रस्य निःसारत्वाल्लघीयसः ।
जन्मिनो मानहीनस्य तृणस्य च समा गतिः ॥ ११५ ॥

शक्तिकी विकलतासे नम्र हुए, निस्सार होनेसे अत्यन्त लघु, मानहीन जन्म धारीकी और तृणकी समान गति है ॥ ११५ ॥

अपिच–
और भी

अन्यप्रतापमासाद्य यो दृढत्वं न गच्छति ।
जतुजाभरणस्येव रूपेणापि हि तस्य किम् ॥ ११६ ॥

दूसरेके प्रतापको प्राप्त होकर जो दृढताको नहीं प्राप्त होताहै लाखके आभरणकी समान उसके रूपसे भी क्या है ॥ ११६ ॥

तदेवं ज्ञात्वा स्वामिना धैर्यावष्टम्भः कार्यः । न शब्दमात्रात् भेतव्यम् । उक्तञ्च–

भाषाटीकासमेतम् । ( ३६ )

यह जानकर स्वामीको धैर्यकी स्थिति करनी योग्य है, शब्दमात्रसे डरना न चाहिये कहाभी है-

पूर्वमेव मया ज्ञातं पूर्णमेतद्धि मेदसा । अनुप्रविश्य विज्ञातं यावच्चर्म च दारु च ॥ ११७ ॥”

मैंने पहले मज्जासे पूर्ण जान लिया था परन्तु पीछे प्रवेश कर देखा तो इसमें चर्म और दारुही निकला ॥ ११७ ॥”

पिङ्गलक आह-“कथमेतत्”? सोऽब्रवीत्- पिंगलक बोला-“यह कैसी कथा है”? । वह बोला-

कथा २ .

कश्चित् गोमायुर्नाम शृगालः क्षुत्क्षामकंठः इतस्ततः परि- भ्रमन् वने सैन्यद्वयसंग्रामभूमिमपश्यत् ।तस्याश्च दुन्दुभेः पति- तस्य वायुवशात् वल्लीशाखाग्रैः हन्यमानस्य शब्दमशृणोत् । अथ क्षुभितहृदयश्चिन्तयामास ।“अहो ! विनष्टोऽस्मि । तद्या- वत् न अस्य प्रोच्चारितशब्दस्य दृष्टिगोचरे गच्छामि तावद् अन्यतो व्रजामि। अथवा नैतत् युज्यते सहसैव पितृपैतामहं वनं त्यक्तुम् । उक्तञ्च-

कोई गोमायु नामवाला शृगाल भूखसे दुर्बल कंठवाला इधर उधर घूमता हुआ वनमे दोनो सेनाकी संग्रामभूमि देखता भया । वहां गिरे हुए नगाडेका पवनके वशसे वल्ली शाखाओके अग्रभागके ताडनसे उठा शब्द सुनता भया । तब क्षुभितहृदय हो विचारने लगा “अहो मैं मरा, सो जबतक इस उच्चारण किये शब्दके सम्मुख नहूं, तबतक यहांसे अन्य स्थानमें जाऊं। अथवा एकसाथै पितामह जनोका यह वन त्यागन करनेके योग्य नहीं है । कहाभी है-

भये वा यदि वा हर्षे संप्राप्ते यो विमर्शयेत् । कृत्यं न कुरुते वेगान्न स सन्तापमाप्नुयात् ॥ ११८ ॥

भय वा हर्षके प्राप्त होनेपर जो विचार करता है और कार्यको शीघ्रतासे नहीं करता है, वह सन्तापको प्राप्त नहीं होता है ॥ ११८ ॥

तत् तावत् जानामि कस्य अयं शब्दः”। धैर्यमाळम्ब्य विमर्शयन् यावत् मन्दं मन्दं गच्छति तावत् दुन्दुभिम् अप-

( ३६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

श्यत् । स च तं परिज्ञाय समीपं गत्वा स्वयमेव कौतुकात् अताडयत् । भूयश्च हर्षात् अचिन्तयत् । “अहो ! चिरादेतत् अस्माकं महत् भोजनमापतितम्,तत् नूनं प्रभूतमांसमेदोऽसृग्भिः परिपूरितं भविष्यति”। ततः परुषचर्मावगुंठितं तत्कथमपि विदार्य्य एकदेशे छिद्रं कृत्वा संहृष्टमना मध्ये प्रविष्टः परं चर्मविदारणतोदंष्ट्राभङ्गः समजनि । अथ निराशीभूतः तत् दारुशेषमवलोक्य श्लोकमेनंमपठत्।“पूर्वमेव मया ज्ञातम्”, इति। ततो न शब्दमात्रात् भेतव्यम्” । पिङ्गलक आह- “भोः ! पश्य अयं मम सर्वोऽपि परिग्रहो भयव्याकुलितमनाः पलायितुमिच्छति । तत् कथमहं धैर्यावष्टम्भं करोमि”। सोऽब्रवी- “स्वामिन् ! नैषामेष दोषो यतः स्वामिसदृशा एव भवन्ति भृत्याः । उक्तञ्च-

सो पहले मैं यह जानूं, कि, यह किसका शब्द है”। धैर्य्यको अवलम्बन कर जबतक शनैः २ गया तबतक नगाडेको देखता भया । वह इसको जान धोरे जाकर स्वयंही कौतुकसे ताडन करता हुआ, फिरभी प्रसन्नतासे विचारता भया । “अहो ! बहुत कालमें यह भोजन हमको प्राप्त हुआहै । सो निश्चयही बहुतसे मांस मेंद रुधिरसे परिपूर्ण होगा” सो कठिन चर्मसे मढे हुए इस (ढोल) को किसी प्रकारसे विदीर्ण करके एक देशमें छिद्र करके प्रसन्नमनसे भीतर प्रविष्ट हुआ । और चर्मके विदारण करनेसे दाढें टूटगईं । तब निराश होकर केवल काष्ठमात्र देखकर इसश्लोकको पढताहुआ कि, “मैने पहिले जाना था” । इससे शब्दमात्रसे न डरना चाहिये” पिंगलक बोला “भो ! देखोयह मेरा सम्पूर्ण कुटुम्ब भयव्याकुल मन होकर भागनेकी इच्छा करता है, सो मैं किस प्रकार धैर्य धारण करूं” । वह बोला- “स्वामिन् ! इनका दोष नहीं जिस कारण कि, भृत्य स्वामीकी समान होते हैं । कहाभी है-

अश्वः शस्त्रं शास्त्रं वीणा वाणी नरश्च नारी च । पुरुषविशेषं प्राप्ता भवन्त्ययोग्याश्च योग्याश्च ॥ ११९ ॥

घोडा, शस्त्र, शास्त्र, वीणा, वाणी, नर और नारी यह पुरुषविशेषको प्राप्त होकर योग्य अयोग्य होजाते हैं ॥ ११९ ॥

भाषाटीकासमेतम् । ( ३७ )

तत् पौरुषावष्टम्भं कृत्वा त्वं तावत् अत्र एव प्रतिपालय-यावदहमेतत् शब्दस्वरूपं ज्ञात्वा आगच्छामि । ततः पश्चात् यथोचितं कार्य्यम्” इति । पिङ्गलक आह-“किं तत्र भवान् गन्तुमुत्सहते ?”। स आह-“किं स्वाम्यादेशात्सद्भृत्यस्य कृत्याकृत्यमस्ति उक्तञ्च-

सो पुरुषार्थका अवलम्बन कर तुम तबतक यहां रहो जबतक मैं इस शब्दस्वरूपको जानकर आऊ, तब पीछे जैसा उचित हो सो करना”। पिंगलक बोला-“क्या आप वहां जानेकी इच्छा करते हो ?”। वह बोला-“स्वामीकी आज्ञासे भृत्यको कृत्यका और अकृत्यका विचार क्या है ? । कहाहै कि-

स्वाम्यादेशात्सुभृत्यस्य न भीः सञ्जायते क्वचित् । प्रविशेन्मुखमाहेयं दुस्तरं वा महार्णवम् ॥ १२० ॥

स्वामीकी आज्ञासे सुभृत्यको कहींभी कुछ भय नहीं होताहै, सर्पके मुखमें प्रवेश करजाय वा दुस्तर महासागर तर जाय ॥ १२० ॥

तथाच- तैसाही-

स्वाम्यादिष्टस्तु यो भृत्यः समं विषममेव च । मन्यते न स सन्धाय्यों भूभुजा भूतिमिच्छता ॥१२१॥”

जो भृत्य स्वामीकी आज्ञाको समवा विषम नहीं मानता है ऐश्वर्यकी इच्छाकरनेवाले राजाओंको सदा उसको अपने समीपमें रखना उचित है ॥ १२१ ॥”

पिङ्गलक आह-“भद्र ! यदि एवं तत् गच्छ शिवास्ते पन्थानः सन्तु” इति । दमनकोऽपि तं प्रणम्य सञ्जीवकशब्दानुसारी प्रतस्थे । अथ दमनके गते भयव्याकुलमनाः पिङ्गलकः चिन्तयामास । “अहो ! न शोभनं कृतं मया, यत् तस्य विश्वासं गत्वा आत्माभिप्रायो निवेदितः । कदाचित दमनकोऽयमुभयवेतनॊ भूत्वा ममोपरि दुष्टबुद्धिः स्यात् भ्रष्टाधिकारत्वात् । उक्तञ्च-

पिंगलक बोला, “भद्र ! जो ऐसा है तो तेरे मार्ग मगलकारी हो” दमनक भी उसको प्रणाम करके सञ्जीवकके शब्दका अनुसरण कर चला । तब दमनकके

( ३८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

जानेमें भयसे व्याकुलमन होकर पिंगलक विचार करने लगा कि, "देखो मैने अच्छा नहीं किया जो इसके विश्वासको प्राप्त होकर मैने अपना भेद कह दिया। जो कदाचित् यह दमनक दोनों तरफका बनकर मेरे ऊपर दुष्टबुद्धि होजायं कारण कि, यह अधिकारसे भ्रष्ट है। कहाहै कि-

ये भवन्ति महीपस्य सम्मानितविमानिताः । यतन्ते तस्य नाशाय कुलीना अपि सर्वदा ॥ १२२ ॥

-जो राजाके पहले सम्मानपात्र होकर पीछे तिरस्कृत होते हैं, चाहे वे कुलीन भी हों तोभी उसके नाशके निमित्त यत्न करते हैं ॥ १२२ ॥

तत् तावदस्य चिकीर्षितं वेत्तुमन्यत् स्थानान्तरं गत्वा प्रतिपालयामि । कदाचित् दमनकः तमादाय मां व्यापादयितुमिच्छति । उक्तञ्च-

सो तबतक इसकी इच्छा देखनेको दूसरे स्थानमें जाकर स्थित रहूं, कदाचित् दमनक उसको साथ लाकर मुझे मरवा डालनेकी इच्छा करताहै क्या कहाहै कि-

न बध्यन्ते ह्यविश्वस्ता बलिभिर्दुर्बला अपि । विश्वस्तास्त्वेव बध्यन्ते बलवन्तोपि दुर्बलैः ॥ १२३ ॥

किसीका विश्वास न करनेवाले दुर्बलभी बलवानोंसे नहीं बंधते हैं और विश्वास करनेसे बलवान्‌ही दुर्बलोंसे बंधजातेहैं ॥ १२३ ॥

बृहस्पतेरपि प्राज्ञो न विश्वासे व्रजेन्नरः । य इच्छेदात्मनो वृद्धिमायुष्यञ्च सुखानि च ॥ १२४ ॥

बुद्धिमान् तो बृहस्पतिके विश्वासमेंभी न जाय जो अपनी आयुवृद्धि और सुखकी इच्छा करता हो ॥ १२४ ॥

शपथैः सन्धितस्यापि न विश्वासे व्रजेद्रिपोः । राज्यलाभोद्यतो वृत्रः शक्रेण शपथैर्हतः ॥ १२५ ॥

शपथसे सन्धान किये शत्रुके विश्वासमें न जाय, देखो विश्वाससेही राज्यलोभसे उद्यत हुए वृत्रको इन्द्रने मार डाला ॥ १२५ ॥

न विश्वासं विना शत्रुद्देवानांमपि सिद्ध्यति । विश्वासात्त्रिदशेन्द्रेण दितेर्गर्भो विदारितः ॥ १२६ ॥”