पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
पृष्ठ 42, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम्। (२७)
उक्तञ्च-
कहा है कि-
असमैः समीयमानः समैश्च परिहीयमाणसत्कारः ।
धुरि यो न युज्यमानस्त्रिभिरेर्थपतिं त्यजति भृत्यः ॥८०॥
जो भृत्य असमान भृत्योंसे समानताको प्राप्त किया जाय तुल्य भृत्योंसे दूर सत्कारवाला किया जाय तथा कार्यभारमें नियुक्त न किया जाय इन तीन कारणोंसे भृत्य राजाको त्याग न करदेता है ॥ ८० ॥
यच्च अविवेकतया राजा भृत्यानुत्तमपदयोग्यान् हीनाधमस्थाने नियोजयति न ते तत्रैव तिष्ठन्ति न भूपतेर्दोषो न तेषाम् । उक्तञ्च-
और जो अज्ञानतासे उत्तम पदके योग्य भृत्योंको हीन अधम स्थानमें नियुक्त करता है, न वे वहा रहते है न राजाका दोष है न उनका । कहाभी है-
कनकभूषणसंग्रहणोचितो यदि मणिस्त्रपुणि प्रतिबध्यते ।
न स विरौति न चापि स शोभते भवति योजयितुर्वचनीयता ॥ ८१ ॥
सुवर्णके गहनेमे लगाने योग्य मणि यदि निकृष्ट धातुमे लगाई जाय, वह मणि न रोती है, न शोभित होती है किन्तु वैसे नियुक्त करनेवालेकी निन्दा होती है कि, लगानेवालेको योग्यायोग्यका ज्ञान नहीं है ॥ ८१ ॥
यच्च स्वामी एवं वदति "चिराद्दृश्यते" तदपि श्रूयताम् ।
सव्यदक्षिणयोर्यत्र विशेषो नास्ति हस्तयोः ।
कस्तत्र क्षणमप्यार्यो विद्यमानगतिर्वसेत् ॥ ८२ ॥
और जो स्वामी यह कहते हैं कि, "बहुत कालमें देखा" सोभी सुनो जिस स्थानमे दहिने बाये हाथका विशेष नहीं है, वहा सब स्थानमे जानेवाला कौन बुद्धिमान् क्षणमात्रभी स्थिति करेगा ॥ ८२ ॥
काचे मणिर्मणौ काचो येषां बुद्धिविकल्प्यते ।
न तेषां सन्निधौ भृत्यो नाममात्रोऽपि तिष्ठति ॥ ८३ ॥
जिनकी बुद्धि काचमे मणि मणिमें काचका विकल्प करती है उनके निकट भृत्यजन नाममात्रकोभी स्थित नहीं होते ॥ ८३ ॥