भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( २८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

परीक्षका यत्र न सन्ति देशे नार्घन्ति रत्नानि समुद्रजानि । आभीरदेशे किल चन्द्रकान्तं त्रिभिर्वराटैर्विपणन्ति गोपाः ८४

जिस देशमें परीक्षा करनेवाले नहीं हैं वहां समुद्रसे उत्पन्न हुए रत्नोंका मूल्य नहीं होता ह आभीर देशमें चन्द्रकान्तमणिको गोप तीन कौडींसे खरीदते हैं ८४

लोहिताख्यस्य च मणेः पद्मरागस्य चान्तरम् । यत्र नास्ति कथं तत्र क्रियते रत्नविक्रयः ॥ ८५ ॥

लोहित मणि और पद्मरागमणिको अन्तर जहां नहीं है, वहां किस प्रकार रत्नोंका विक्रय होसक्ता है ॥ ८५ ॥

निर्विशेषं यदा स्वामी समं भृत्येषु वर्त्तते । तत्रोद्यमसमर्थानामुत्साहः परिहीयते ॥ ८६ ॥

जब स्वामी सबभृत्योंमें एकसा विशेषतः रहित वर्तता है वहां उद्यममें समर्थोंका उत्साह हीन हो जाताहै ॥ ८६ ॥

न विना पार्थिवो भृत्यैर्न भृत्याः पार्थिवं विना । तेषां च व्यवहारोऽयं परस्परनिबन्धनः ॥ ८७ ॥

भृत्योंके विना राजा नहीं और न राजाके बिना भृत्य हैं, उनका यह व्यवहार पस्पर निबन्धवाला है ॥ ८७ ॥

भृत्यैर्विना स्वयं राजा लोकानुग्रहकारिभिः । मयूखैरिव दीप्तांशुस्तेजस्यपि न शोभते ॥ ८८ ॥

भृत्योंके विना राजा ऐसे शोभित नहीं होता जिस प्रकार लोककी अनुग्रह-करनेवाली किरणोंके बिना तेजस्वी सूर्य नहीं शोभित होता है ॥ ८८ ॥

अरैः सन्धाय्यन्ते नाभिर्नाभौ चाराः प्रतिष्ठिताः । स्वामिसेवकयोरेवं वृत्तिचक्रं प्रवर्त्तते ॥ ८९ ॥

अरोंमें नाभि और नाभि ( पुट्ठे ) में अरे स्थित रहते हैं, इस प्रकारसे यह स्वामी सेवकका आजीविका चक्र चलता है ॥ ८९ ॥

शिरसा विधृता नित्यं स्नेहेन परिपालिताः । केशा अपि विरज्यन्ते निःस्नेहाः किं न सेवकाः ॥ ९० ॥

नित्य शिरसे धारण किये स्नेहसे परिपालित तेलके बिना केशभी रूखे हो जाते हैं, क्या सेवक न होंगे ॥ ९० ॥