पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
सुख भोगमें रत, फणावाले, वस्त्रधारी, केंचलीधारी, कुटिल ( कपटी ), टेढी गतिवाले, निष्ठुरचेष्टावाले, दुष्टराजा सर्पकी समान मन्त्र चित्तानुवृत्तिसेही साध्य होते हैं ॥ ६९ ॥
द्विजिह्वाः क्रूरकर्माणोऽनिष्टाश्छिद्रानुसारिणः ।
दूरतोऽपि हि पश्यन्ति राजानो भुजगा इव ॥ ७० ॥
दो जिह्वावाले, क्षण क्षणमे भिन्न बचन कहनेवाले, क्रूरकर्म करनेवाले, अनिष्ट ( निष्पत्तिरहित ) दोषके देखनेवाले, ( बिलमें गमन करनेवाले ) राजा सर्पोंकी समान दूरसेही देखते हैं ॥ ७० ॥
स्वल्पमप्यपकुर्वन्ति येऽभीष्टा हि महीपतेः ।
ते वह्नाविव दह्यन्ते पतङ्गाः पापचेतसः ॥ ७१ ॥
जो राजाके इष्टपुरुष उनका थोडाभी अनिष्ट करते हैं, वे पापचित्तवाले अग्निमें पतंगकी समान जलते हैं ॥ ७१ ॥
दुरारोहं पदं राज्ञां सर्वलोकनमस्कृतम् ।
स्वल्पेनाप्यपकारेण ब्राह्मण्यमिव दुष्यति ॥ ७२ ॥
सब लोकोंसे नमस्कार करनेके योग्य राजोंका पद दुरारोह ( कठिनसे प्राप्त ) है, थोडेसेभी अपकारसे ब्राह्मणत्वकी समान दूषित होजाता है ॥ ७२ ॥
दुराराध्याः श्रियो राज्ञां दुरापा दुष्परिग्रहाः ।
तिष्ठन्त्याप इवाधारे चिरमात्मनि संस्थिताः ॥ ७३ ॥”
राजलक्ष्मी कठिनतासे सेवनीय होसक्ती है, इसी कारण दुर्लभ और प्राप्य होनेको अशक्य है, लक्ष्मी आधार ( पात्र ) में जलकी समान यत्नसे रक्षित की हुई चिरकालतक अपने पास रहती है ॥ ७३ ॥”
' दमनक आह—" सत्यमेतत्परं किन्तु-
दमनक बोला,—" यह सत्य है किन्तु—
यस्य यस्य हि यो भावस्तेन तेन समाचरेत् ।
अनुप्रविश्य मेधावी क्षिप्रमात्मवशं नयेत् ॥ ७४ ॥
जिस जिसका जो जो भाव है; उस उस भावसे उसको सेवन करै, बुद्धिमान् उसमें प्रवेश कर शीघ्र अपने वशमे करै ॥ ७४ ॥
भर्तुश्चित्तानुवर्तित्वं सुवृत्तं चानुजीविनाम् ।
राक्षसाश्चापि गृह्यन्ते नित्यं छन्दानुवर्तिभिः ॥ ७५ ॥