भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । (२३)

अपायसन्दर्शनजां विपत्तिमुपायसन्दर्शनजाञ्च सिद्धिम् ।
मेधाविनो नीतिगुणप्रयुक्तां पुरःस्फुरन्तीमिव वर्णयन्ति ६५

'अपायसे प्राप्त होनेवाली विपत्ति, उपायके करनेसे सिद्धि बुद्धिमान् नीतिके गुणसे प्रयुक्त की हुई आगे स्फुरायमान होते हुएकी समान वर्णन करते हैं ॥६५॥

एकेषां वाचि शुकवदन्येषां हृदि मूकवत् ।
हृदि वाचि तथान्येषां वल्गु वलगन्ति सूक्तयः ॥ ६६ ॥

किन्हींके वचन बोलनेमे तोतेकी समान मधुर और मनमे कपट, कोई हृदयमें मूकवत् अर्थात् वाक्य तो सुननेमें कठोर और हृदय कपटशून्य, दूसरे पुरुषोंके सुवचन हृदय और वचन दोनोंसेही सारताको प्रगट करते हैं ॥ ६६ ॥

न च अहमप्राप्तकालं वक्ष्ये । आकर्णितं मया नीतिसारं पितुः पूर्वमुत्सङ्गं हि निषेवता ।

मैं असमयके वचनोको न कहूँगा, पिताकी गोदीको सेवन करते हुए पहिले मैने सुना है ।

अप्राप्तकालं वचनं बृहस्पतिरपि ब्रुवन् ।
लभते बह्ववज्ञानमपमानञ्च पुष्कलम् ॥ ६७ ॥”

अप्राप्त कालके वचनोंको बृहस्पतिभी कहै तो बहुत अवज्ञा और अपमानको प्राप्त होते हैं ॥ ६७ ॥ ”

करटक आह-
करटक बोला-

“ दुराराध्या हि राजानः पर्वता इव सर्वदा ।
व्यालाकीर्णाः सुविषमाः कठिना दुष्टसेविताः ॥ ६८ ॥

“पर्वतकी समान राजा सदा दुराराध्य हैं, जैसे कि राजा और पर्वत सर्प ( हिंस्रजन ) श्वापद जीवोसे युक्त दारुण और नीचे ऊंचे मागोंसे विषम होते हैं, इसी प्रकार राजा दुष्ट सेवित होनेसे कठिन होते हैं ॥ ६८ ॥

तथाच-
और देखो-

भोगिनः कञ्चुकाविष्टाः कुटिलाः क्रूरचेष्टिताः ।
सुदुष्टा मन्त्रसाध्याश्च राजानः पन्नगा इव ॥ ६९ ॥