भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 354

भाषाटीकासमेतम् । ( ३३९ )

पक्षिणो गतासून् कृत्वा शीघ्रमानयत” । राजादेशानन्तर- मेव प्रचेलुस्ते । अथ लगुडहस्तान् राजपुरुषान् दृष्ट्वा तत्र एकेन पक्षिणा वृद्धेन उक्तं,-“भोः स्वजनाः ! न शोभनमाप- तितम् । ततः सर्वैः एकमतीभूय शघ्रिमुत्पतितव्यम्” । तैश्च तथानुष्ठितम् । अतोऽहं ब्रवीमि-

किसी स्थानमें एक चित्ररथ नाम राजा था। उसके योधायोंसे रक्षित पद्मसरनाम एक सरोवर था वहा बहुतसे सुवर्णमय हसथे । छठे २ महीनेसे एक एक पख त्यागते रहे तब उस सरोवरमें सुवर्णमय बडा पक्षी आया । उन्होंने कहा,-“हमारे बीचमे तुमको रहना न चाहिये । जिस कारणसे कि हमने छःमहीनेमे एक २ पखदान करके यह सरोवर प्राप्त किया है । ऐसा बहुत कहनेसे परस्पर उनका द्वेष उत्पन्न हुआ । वह राजाकी शरणमे जाकर कहने लगा,-“देव यह पक्षी इस प्रकारसे कहते हैं कि,-“हमारा राजा क्या करेगा ? । किसीको हम स्थान न देंगे” मैने कहा-“तुमने अच्छा नही कहा । मै जाकर राजासे कहूँगा” । इस कार्यमें स्वामीही प्रमाणहैं” । तब राजा भृत्योंसे बोला-“भो भो ! जाओ सब पक्षियोंको प्राणरहित करके शीघ्र लाओ ” । वे राजाकी आज्ञा पातेही चले । तब लगुड हाथमें लिये राजपुरुषोको देख एक वृद्ध पक्षीने कहा,-“भो सुजनो भलीबात न हुई सो सब एकमत होकर शीघ्र उडो” और उन्होंने वैसाही अनुष्ठान किया इससे मैं कहताहूं-

भृत्यान्यो नानुगृह्णाति ह्यात्मनः शरणागतान् । भूतार्थास्तस्य नश्यन्ति हंसाः पद्मवने यथा ॥ १३७ ॥”

कि अपनी शरणमे आये हुए भृत्योंपर जो अनुग्रह नहीं करताहै उसके भूत अर्थ नष्ट हो जातेहैं जैसे पद्मवनमें हस ॥ १३७ ॥”

इत्युक्त्वा पुनरपि ब्राह्मणः प्रत्यूषे क्षीरं गृहीत्वा, तत्र गत्वा तारस्वरेण सर्पमस्तौत् । तथा सर्पश्विरं वल्मीकद्वारान्तर्लीन एव ब्राह्मणं प्रत्युवाच त्वं लोभादत्र आगतः पुत्रशोकमपि विहाय । अतः परं तव मम च प्रीतिर्नोचिता । तव पुत्रेण यौवनोन्मदेन अहं ताडितः । मया स दष्टः । कथं मया लगु

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