भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 355

( ३४० ) पंचतन्त्रम् ।

डप्रहारो विस्मर्त्तव्यः, ? त्वया पुत्रशोकदुःखं कथं विस्मर्त्त-व्यम् ?”। इत्युक्त्वा बहुमूल्यं हीरकमणिं तस्मै दत्त्वा “अतः परं पुनस्त्वया न आगन्तव्यम्” इति पुनरुक्त्वा विवरान्तर्गतः। ब्राह्मणश्च मणिं गृहीत्वा पुत्रबुद्धिं निन्दन् स्वगृहमागतः । अतोऽहं ब्रवीमि–

यह कह फिरभी ब्राह्मण प्रातःकाल दूध ग्रहण कर वहां जाकर ऊंचे स्वरसे सर्पकी स्तुति करने लगा । तब सर्प अधिक वल्मीकके भीतर लीन हुआही ब्राह्मणसे बोला—“तू लोभसे यहां आया है पुत्रशोक भी छोड दिया ! अब तेरी और मेरी प्रीति उचित नहीं । यौवनके मदसे तेरे पुत्रने मुझे ताडन किया है। मैंने उसे काट लिया । किस प्रकार मै लगुडप्रहार भूल जाऊंगा ? और तू पुत्रशोकका दुःख किस प्रकार भूल सकता है ?” । ऐसा कह एक बहुत मोलका हीरा उसे देकर “बस अब तू यहां न आना” यह फिर कह विवरके भीतर गया । ब्राह्मणभी मणिको ले पुत्रकी बुद्धिकी निन्दा करता अपने घर आया । इससे मैं कहता हूं–

“चितिकां दीपितां पश्य फटां भग्नां ममैव च । भिन्नश्लिष्टा तु या प्रीतिर्न सा स्नेहेन वर्द्धते ॥ १३८ ॥”

“प्रज्वलित चिता और फटा हुआ मेरा फन देखकर जानले कि भिन्न होकर जुडी प्रीति स्नेहसे नहीं बढती ॥ १३८ ॥”

तदस्मिन् हते यत्नादेव राज्यमकण्टकं भवतो भवति” । तस्य एतद्वचनं श्रुत्वा क्रूराक्षं पप्रच्छ,–“भद्र ! त्वं तु किं मन्यसे ?” सोऽब्रवीत,–“देव ! निर्दयमेतत्, यदनेन अभि-हितम् । यत् कारणं शरणागतो न वध्यते । सुष्ठु खलु इदमाख्यातम्–

सो इसके मारनेसे यत्नपूर्वक तुम्हारा अकंटक राज्यहो”, उसके यह वचन सुन क्रूराक्षसे पूछा–“भद्र ! तुम इसमें क्या मानते ?” । वह बोला–“देव यह निर्दयता है जो इस मन्त्रीने कहा है । कारण कि शरणमें आया हुआ नहीं मारा जाता । यह सत्य कहा गया है कि–