भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 356, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 356

भाषाटीकासमेतम् । ( ३४१ )

श्रूयते हि कपोतेन शत्रुः शरणमागतः । पूजितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसैर्निमन्त्रितः ॥ १३९ ॥”

सुना है कि, कबूतरने शरणमें आये हुए शत्रुको यथायोग्य पूजन कर अपने मांससे निमंत्रित किया ॥ १३९ ॥”

अरिमर्द्दनोऽब्रवीत्— “कथमेतत् ?” । क्रूराक्षः कथयति—
अरिमर्द्दन बोला—“यह कैसे ?” क्रूराक्ष कहने लगा—

कथा ७.

कश्चित्क्षुद्रसमाचारः प्राणिनां कालसन्निभः ।
विचचार महारण्ये घोरः शकुनिलुब्धकः ॥ १४० ॥

कोई क्षुद्र आचारवाला प्राणियोंको कालकी समान घोर पक्षियोंका लुब्धक वनमें विचरता था ॥ १४० ॥

नैव कश्चित्सुहृत्तस्य न सम्बन्धी न बान्धवः ।
स तैः सर्वैः परित्यक्तस्तेन रौद्रेण कर्मणा ॥ १४१ ॥

न कोई उसका सुहृत्, न सम्बन्धी, न बान्धव था, उसके क्रूर कर्मसे सबने उसे त्याग दिया ॥ १४१ ॥

अथवा—
अथवा—

ये नृशंसा दुरात्मानः प्राणिनां प्राणनाशकाः ।
उद्वेजनीया भूतानां व्याला इव भवन्ति ते ॥ १४२ ॥

जो क्रूर दुरात्मा प्राणियोंके प्राण नाशक हैं वे भूतोंके उद्वेगकारक कालकी समान होते हैं ॥ १४२ ॥

स पञ्जरकमादाय पाशं च लगुडं तथा ।
नित्यमेव वनं याति सर्वप्राणिविहिंसकः ॥ १४३ ॥

वह सब प्राणियोंकी हिंसा करनेवाला पिंजरा पाश और लगुड लेकर नित्यही वनको जाता ॥ १४३ ॥

अन्येद्युर्भ्रमतस्तस्य वने कापि कपोतिका ।
जाता हस्तगता तां स प्राक्षिपत्पञ्जरान्तरे ॥ १४४ ॥