पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३४२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
एक दिन उसके वनमें घूमते हुए कोई कबूतरी हाथ आई उसने उसे पिंजरेमें डाल लिया ॥ १४४ ॥
अथ कृष्णा दिशः सर्वा वनस्थस्याभवन्घनैः ।
वातवृष्टिश्च महती क्षयकाल इवाभवत् ॥ १४५ ॥
तब उस वनकी सब दिशा मेघोंसे श्याम होगईं क्षय कालकी समान बडी पवन चली और वर्षा हुई ॥ १४५ ॥
ततः सन्त्रस्तहृदयः कम्पमानो मुहुर्मुहुः ।
अन्वेष्यन्परित्राणमाससाद वनस्पतिम् ॥ १४६ ॥
तब संत्रस्त हृदय होकर वारम्वार कम्पित हुआ वह परित्राण (रक्षा) खोजता हुआ वृक्षके नीचे प्राप्त हुआ ॥ १४६ ॥
मुहूर्त्तं भ्रश्यते यावद्वियद्विमलतारकम् ।
प्राप्य वृक्षं वदत्येव योऽत्र तिष्ठति कश्चन ॥ १४७ ॥
जब मुहूर्त्त मात्रमें आकाश निर्मल तारेवाला हुआ तब वृक्षको प्राप्त होकर बोला,–"जो कोई यहां स्थितहो ॥ १४७ ॥
तस्याहं शरणं प्राप्तः स परित्रातु मामिति ।
शीतेन भिद्यमानञ्च क्षुधया गतचेतसम् ॥ १४८ ॥
उसीकी मैं शरणमे प्राप्त हूं मेरी वह रक्षा करे मैं शीतसे भेदित और भूखसे व्याकुल हूं ॥ १४८ ॥
अथ तस्य तरोः स्कन्धे कपोतः सुचिरोषितः ।
भार्याविरहितस्तिष्ठन्विललाप सुदुःखितः ॥ १४९ ॥
उसी वृक्षकी शाखामें कबूतर बहुत कालसे रहताथा वह उस समय स्त्रीके बिना विलाप कर रहा दुःखी था ॥ १४९ ॥
वातवर्षो महानासीन्न चागच्छति मे प्रिया ।
तया विरहितं ह्येतच्छून्यमद्य गृहं मम ॥ १५० ॥
बडी वात और वर्षा हुई है अभीतक मेरी प्यारी नहीं आई उसके विना आज यह मेरा घर सूना है ॥ १५० ॥
पतिव्रता पतिप्राणा पत्युः प्रियहिते रता ।
यस्य स्यादीदृशी भार्या धन्यः स पुरुषो भुवि ॥ १५१ ॥