भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ३४३ )

पतिव्रता पतिकी प्राण पतिके प्रिय और हितमे तत्पर जिसके ऐसी भार्या है वह पुरुष पृथिवीमें धन्य है ॥ १९१ ॥

न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते ।
गृहं हि गृहिणीहीनमरण्यसदृशं मतम् ॥ १५२ ॥

घरका नाम घर नहीं किन्तु स्त्रीका नाम गृह है, गृहिणीके बिना घर वनके समान है ॥ १५२ ॥

पञ्जरस्था ततः श्रुत्वा भर्तुर्दुःखान्वितं वचः ।
कपोतिका सुसन्तुष्टा वाक्यञ्चेदमथाह सा ॥ १५३ ॥

तब पींजरेमें स्थित हुई कबूतरी उसके दुःखभरे वचन सुनकर इस प्रकार सन्तुष्ट होकर कहने लगी ॥ १५३ ॥

न सा स्त्रीत्यभिमन्तव्या यस्यां भर्त्ता न तुष्यति ।
तुष्टे भर्त्तरि नारीणां तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥ १५४ ॥

उसमें स्त्रीपन मत मानो जिससे कि स्वामी प्रसन्न नहीं होता नारियोंके पति प्रसन्न होनेमें सब देवता उसपर प्रसन्न होजाते हैं ॥ १५४ ॥

दावाग्निना विदग्धेव सपुष्पस्तवका लता ।
भस्मीभवतु सा नारी यस्यां भर्त्ता न तुष्यति ॥ १५५ ॥

दावाग्निसे दग्ध हुई फल गुच्छेवाली लताकी समान वह स्त्री भस्म होजातीहै जिसपर स्वामी प्रसन्न नहीं होता ॥ १५५ ॥

मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः ।
अमितस्य हि दातारं भर्त्तारं का न पूजयेत् ॥ १५६ ॥

पिता माता पुत्र परिमित सुख देते हैं, इससे अमित दान देनेवाले भर्त्ताका पूजन कौन न करे ॥ १५६ ॥

पुनश्च अब्रवीत्-
फिरभी बोली-

शृणुष्वावहितः कान्त यत्ते वक्ष्याम्यहं हितम् ।
प्राणैरपि त्वया नित्यं संरक्ष्यः शरणागतः ॥ १५७ ॥

हे स्वामी ! सावधान होकर सुनो जो मैं तुमको हितकर वचन कहतीहूं शरणमें आया पुरुष प्राणोंसे अधिक रक्षा करना चाहिये ॥ १५७ ॥

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