पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
भाषाटीकासमेतम् । ( ३४३ )
पतिव्रता पतिकी प्राण पतिके प्रिय और हितमे तत्पर जिसके ऐसी भार्या है वह पुरुष पृथिवीमें धन्य है ॥ १९१ ॥
न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते ।
गृहं हि गृहिणीहीनमरण्यसदृशं मतम् ॥ १५२ ॥
घरका नाम घर नहीं किन्तु स्त्रीका नाम गृह है, गृहिणीके बिना घर वनके समान है ॥ १५२ ॥
पञ्जरस्था ततः श्रुत्वा भर्तुर्दुःखान्वितं वचः ।
कपोतिका सुसन्तुष्टा वाक्यञ्चेदमथाह सा ॥ १५३ ॥
तब पींजरेमें स्थित हुई कबूतरी उसके दुःखभरे वचन सुनकर इस प्रकार सन्तुष्ट होकर कहने लगी ॥ १५३ ॥
न सा स्त्रीत्यभिमन्तव्या यस्यां भर्त्ता न तुष्यति ।
तुष्टे भर्त्तरि नारीणां तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥ १५४ ॥
उसमें स्त्रीपन मत मानो जिससे कि स्वामी प्रसन्न नहीं होता नारियोंके पति प्रसन्न होनेमें सब देवता उसपर प्रसन्न होजाते हैं ॥ १५४ ॥
दावाग्निना विदग्धेव सपुष्पस्तवका लता ।
भस्मीभवतु सा नारी यस्यां भर्त्ता न तुष्यति ॥ १५५ ॥
दावाग्निसे दग्ध हुई फल गुच्छेवाली लताकी समान वह स्त्री भस्म होजातीहै जिसपर स्वामी प्रसन्न नहीं होता ॥ १५५ ॥
मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः ।
अमितस्य हि दातारं भर्त्तारं का न पूजयेत् ॥ १५६ ॥
पिता माता पुत्र परिमित सुख देते हैं, इससे अमित दान देनेवाले भर्त्ताका पूजन कौन न करे ॥ १५६ ॥
पुनश्च अब्रवीत्-
फिरभी बोली-
शृणुष्वावहितः कान्त यत्ते वक्ष्याम्यहं हितम् ।
प्राणैरपि त्वया नित्यं संरक्ष्यः शरणागतः ॥ १५७ ॥
हे स्वामी ! सावधान होकर सुनो जो मैं तुमको हितकर वचन कहतीहूं शरणमें आया पुरुष प्राणोंसे अधिक रक्षा करना चाहिये ॥ १५७ ॥
( ३४४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
एष शाकुनिकः शेते तवावासं समाश्रितः ।
शीतार्त्तश्च क्षुधार्त्तश्च पूजामस्मै समाचर ॥ १६८ ॥
यह पक्षीका पकडनेवाला तुम्हारे स्थानमें प्राप्त हुआ सोता है और भूखसे व्याकुल है तू इसका सत्कार कर ॥ १६८ ॥
श्रूयते च—
सुना है कि—
यः सायमतिथिं प्राप्तं यथाशक्ति न पूजयेत ।
तस्यासौ दुष्कृतं दत्त्वा सुकृतं चापकर्षति ॥ १६९ ॥
संध्याके समय प्राप्त हुए अतिथिको जो यथाशक्ति पूजन नहीं करता है उसको यह अपना पाप दे उसका पुण्य लेकर चला जाता है ॥ १६९ ॥
मा चास्मै त्वं कृथा द्वेषं बद्धानेनेति मत्प्रिया ।
स्वकृतैरेव बद्धाहं प्राक्तनैः कर्मबन्धनैः ॥ १६० ॥
इसने मेरी प्रिया बांधली है इस कारण इससे द्वेष मत करो मैं अपने किये पूर्व जन्मके कर्मानुसारही बन्धी हूं ॥ १६० ॥
दारिद्र्यरोगदुःखानि बन्धनव्यसनानि च ।
आत्मापराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम् ॥ १६१ ॥
दरिद्र, रोग, दुःख, बन्धन, व्यसन यह आत्मापराधवृक्षके फल देह धारियोंको होते हैं ॥ १६१ ॥
तस्मात्त्वं द्वेषमुत्सृज्य मद्धन्धनसमुद्भवम् ।
धर्मे मनः समाधाय पूज्यैनं यथाविधि ॥ १६२ ॥
इस कारण तू मेरे बंधनसे उत्पन्न हुए द्वेषको त्यागन कर धर्ममें मनको लगाय यथाविधिसे इसको पूजनकर ॥ १६२ ॥
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा धर्मयुक्तिसमन्वितम् ।
उपगम्य ततोऽधृष्टः कपोतः प्राह लुब्धकम् ॥ १६३ ॥
उसके धर्म और युक्तिके वचन सुनकर लुब्धकके पास जाय नम्रतासे कपोत बोला ॥ १६३ ॥
सुस्वागतं भद्र तेऽस्तु ब्रूहि किं करवाणि ते ।
सन्तापश्च न कर्त्तव्यः स्वगृहे वर्त्तते भवान् ॥ १६४ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( ३४५ )
हे भद्र! आपका शुभागमनहो कहो मै तुम्हारा क्या प्रिय करू दु ख मत मानना तुम अपने घरमेंही प्राप्त हो ॥ १६४ ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच विहंगमम् । कपोत खलु शीतं मे हिमत्राणं विधीयताम् ॥ १६५ ॥
उसके यह वचन सुन ( वह व्याधा ) पक्षीसे बोला हे कबूतर, मुझे जाडा बहुत लगता है जाडेसे बचाओ ॥ १६५ ॥
स गत्वाङ्गारकं नीत्वा पातयामास पावकम् । ततः शुष्केषु पर्णेषु तमाशु समदीपयत् ॥ १६६ ॥
तब वह जाकर ( चोंचमें ) अंगारेकी लकडी लाकर अग्निको गिराता हुआ और फिर सूखे पत्तोंमे उसको जलाता हुआ ॥ १६६ ॥
सुसन्दीप्तं ततः कृत्वा तमाह शरणागतम् । सन्तापयस्व विश्रब्धं स्वगात्राण्यत्र निर्भयः । न चास्ति विभवः कश्चिन्नाशये येन ते क्षुधम् ॥ १६७ ॥
अग्निको दीप्तकर उस शरणमे आये हुएसे बोला अब निर्भय होकर तुम अपने गात्रको तपायो और कुछ वैभव तो है नहीं जिससे तुम्हारी क्षुधा निवृत्त करूं ॥ १६७ ॥
सहस्रं भरते कश्चिच्छतमन्यो दशापरः । मम त्वकृतपुण्यस्य क्षुद्रस्यात्मापि दुर्भरः ॥ १६८ ॥
कोई सहस्रको, कोई सौको, कोई दशको पालन करताहै अपुण्यकारी मुझ क्षुद्रका शरीर तो एककी तृप्तिके निमित्त भी पूर्ण नहींहै ॥ १६८ ॥
एकस्याप्यतिथेरन्नं यः प्रदातुं न शक्तिमान् । तस्यानेकपरिक्लेशे गृहे किं वसतः फलम् ॥ १६९ ॥
जो एक अतिथिको भी अन्नदेनेकी सामर्थ्य नहीं रखता उसका अनेक क्लेश-वाले घरमे रहनेसे क्या फलहै ? ॥ १६९ ॥
तत्तथा साधयाम्येतच्छरीरं दुःखजीवितम् । यथा भूयो न वक्ष्यामि नास्तीत्यर्थिसमागमे ॥ १७० ॥
सो इस दुःख जीवित शरीरको इस प्रकारसे साधन करूंगा कि जो फिर अर्थीके समीप मेरे पास कुछ नहीं ऐसा न कहसकू ॥ १७० ॥
( ३४६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
स निनिन्द किलात्मानं न तु तं लुब्धकं पुनः । उवाच तर्पयिष्ये त्वां मुहूर्त्तं प्रतिपालय ॥ १७१ ॥
वह अपनी ही निन्दा करके न कि उस लुब्धककी इस प्रकार वह (कबूतर) लुब्धकसे बोला एक मुहूर्त्ततक तू ठहर ॥ १७१ ॥
एवमुक्त्वा स धर्मात्मा प्रहृष्टेनान्तरात्मना । तमग्निं सम्परिक्रम्य प्रविवेश स्ववेश्मवत् ॥ १७२ ॥
ऐसा कह वह धर्मात्मा प्रसन्न मनसे उस अग्निकी परिक्रमाकर अपने घरकी समान उसमें प्रवेश करगया ॥ १७२ ॥
ततस्तं लुब्धको दृष्ट्वा कृपया पीडितो भृशम् । कपोतमग्नौ पतितं वाक्यमेतदभाषत ॥ १७३ ॥
तब यह लुब्धक उसको देख कृपासे अत्यन्त पीडितहो अग्निमें गिरते कबूतरसे यह वचन बोला ॥ १७३ ॥
यः करोति नरः पापं न तस्यात्मा ध्रुवं प्रियः । आत्मना हि कृतं पापमात्मनैव हि भुज्यते १७४ ॥
जो मनुष्य पाप करता है अवश्यही उसको आत्मा प्रिय नहीं है आत्माके किये पापको आत्माही भोगता है ॥ १७४ ॥
सोऽहं पापमतिश्चैव पापकर्मरतः सदा । पतिष्यामि महाघोरे नरके नात्र संशयः ॥ १७५ ॥
वह मैं पापमति पापकर्ममें सदा रत महाघोर नरकमें पडूंगा इसमें कुछ सन्देह नहीं ॥ १७५ ॥
नूनं मम नृशंसस्य प्रत्यादर्शः सुदर्शितः । प्रयच्छता स्वमांसानि कपोतेन महात्मना ॥ १७६ ॥
अवश्यही अपना मांस देते हुए इस महात्मा कपोतने मुझ निर्दयीको शिक्षा दी है ॥ १७६ ॥
अद्य प्रभृति देहं स्वं सर्वभोगविवर्जितम् । तोयं स्वल्पं यथा ग्रीष्मे शोषयिष्याम्यहं पुनः ॥ १७७ ॥
आजसे सम्पूर्ण भोगरहित इस देहको गरमीमें थोडे जलकी समान सुखा डालूंगा ॥ १७७ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( ३४७ )
शीतवातातपसहः कृशाङ्गो मलिनस्तथा ।
उपवासैर्बहुविधैश्चरिष्ये धर्ममुत्तमम् ॥ १७८ ॥
शीत वात गरमीका सहनेवाला कृश अंग मलीन मैं अनेक उपवास कर धर्म करूंगा ॥ १७८ ॥
ततो यष्टिं शलाकाञ्च जालकं पञ्जरं तथा ।
बभञ्ज लुब्धकोपीमां कपोतीञ्च मुमोचह ॥ १७९ ॥
तब वह लुब्धक लकडी शलाका जाल पींजरा तोडकर उस दीन कपोतीको भी छोड देता हुआ ॥ १७९ ॥
लुब्धकेन ततो मुक्ता दृष्ट्वाग्नौ पतितं पतिम् ।
कपोती विललापार्त्ता शोकसन्तप्तमानसा ॥ १८० ॥
वह लुब्धकसे छोडी हुई कपोती अग्निमें पतिको गिरा देख शोक सन्ताप मनसे व्याकुल हो विलाप करने लगी ॥ १८० ॥
न कार्य्यमद्य मे नाथ जीवितेन त्वया विना ।
दीनायाः पतिहीनायाः किं नार्य्या जीविते फलम् ॥ १८१ ॥
हे नाथ ! तुम्हारे बिना मुझे जीनेसे अब काम नहीं है दीन पतिहीन स्त्रीके जीनेसे क्या फल है ? ॥ १८१ ॥
मनोदर्पस्त्वहङ्कारः कुलपूजा च बन्धुषु ।
दासभृत्यजनेष्वाज्ञा वैधव्येन प्रणश्यति ॥ १८२ ॥
मनका हर्ष, अहंकार, बन्धुओंमें कुल गौरव, दास तथा भृत्यजनोंमें आज्ञा यह सब वैधव्य होनेमें नष्ट होजाता है ॥ १८२ ॥
एवं विलप्य बहुशः कृपणं भृशदुःखिता ।
पतिव्रता सुसन्दीप्तं तमेवाग्निं विवेश सा ॥ १८३ ॥
इस प्रकार बहुत विलाप कर दीन दुखी हो वह पतिव्रता उस प्रदीप्त अग्निमें प्रवेश कर गई ॥ १८३ ॥
ततो दिव्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिता ।
भर्त्तारं सा विमानस्थं ददर्श स्वं कपोतिका ॥ १८४ ॥
तब दिव्य वस्त्र पहरे दिव्य गहनोंसे भूषित वह कपोती विमानमें अपने स्वामीको देखने लगी ॥ १८४ ॥
( ३४८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
सोऽपि दिव्यतनुर्भूत्वा यथार्थमिदमब्रवीत् ।
अहो मामनुगच्छन्त्या कृतं साधु शुभे त्वया ॥ १८५ ॥
और वह भी दिव्य शरीर हो यथार्थ ऐसा कहने लगा हे शुभे ! मेरे पीछे आई यह तुमने अच्छा किया ॥ १८५ ॥
तिस्रः कोट्योऽर्द्धकोटी च यानि रोमाणि मानुषे ।
तावत्कालं वसेत्स्वर्गे भर्त्तारं यानुगच्छति ॥ १८६ ॥
साढेतीन करोड जितने रोम मनुष्यके हैं इतने समयतक वह स्त्री स्वर्गमें निवास करती है जो अपने स्वामीके पीछे अनुगमन करतीहै ॥ १८६ ॥
कपोतदेवः सूर्यास्ते प्रत्यहं सुखमन्वभूत् ।
कपोतदेहवत्सासीत्प्राक्पुण्यप्रभवं हि तत् ॥ १८७ ॥
वह कपोतदेव सूर्यास्तमें प्रतिदिन सुख अनुभव करता था और वह कपोती पूर्वजन्मके पुण्यप्रभावसे कपोत देहवत् होगई ॥ १८७ ॥
हर्षाविष्टस्ततो व्याधो विवेश च वनं घनम् ।
प्राणिहिंसां परित्यज्य बहुनिर्वेदवान्भृशम् ॥ १८८ ॥
तब प्रसन्न हो वह व्याधा गहन वनमें प्रवेश करगया । और प्राणीकी हिंसा त्यागन कर बहुत निर्वेदवाला होकर ॥ १८८ ॥
तत्र दावानलं दृष्ट्वा विवेश विरताशयः ।
निर्दग्धकल्मषो भूत्वा स्वर्गसौख्यमवाप्तवान् ॥ १८९ ॥
वहां दावानल लगी देखकर उसमें प्रवेश करगया और पापरहित होकर स्वर्गका सुख भोगने लगा ॥ १८९ ॥
अतोऽहं ब्रवीमि—
इससे मैं कहता हूं—
"श्रूयते हि कपोतेन शत्रुः शरणमागतः ।
पूजितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसैर्निमन्त्रितः ॥ १९० ॥"
"सुना है कि, कपोतने शरणमें आये शत्रुको यथायोग्य पूजन कर अपने मांससे निमंत्रित किया ॥ १९० ॥"
तत श्रुत्वा अरिमर्दनो दीप्ताक्षं पृष्टवान्—"एवमवस्थिते किं भवान् मन्यते?" सोऽब्रवीत्,—"देव ! न हन्तव्य एवायम् ।
भाषाटीकासमेतम् । ( ३४९ )
यह सुन अरिमर्दनने दीप्ताक्षसे पूछा- "ऐसा कहनेपर आप क्या मानते हो?" । वह बोला- "देव ! इसको मत मारो-
यतः-
जिससे-
या ममोद्विजते नित्यं सा मामद्यावगूहते ।
प्रियकारक भद्रं ते यन्ममास्ति हरस्व तत् ॥ १९१ ॥
जो निरन्तर मुझसे क्लेश मानती थी वह आज मुझे आलिंगन करती है हे प्रियकारक ! तुम्हारा मगल हो जो मेरा है उसे ग्रहण कर ( चोरके प्रति गृहस्थीका वचन है ) ॥ १९१ ॥
चौरेण चापि उक्तम्-
तब चोरने भी कहा-
"हर्त्तव्यं ते न पश्यामि हर्त्तव्यं चेद्भविष्यति ।
पुनरप्यागमिष्यामि यदीयं नावगूहते ॥ १९२ ॥"
तेरे हरने योग्य धनको नहीं देखता हू जो हरने योग्य होगा तो फिर भी आऊंगा जो यह स्त्री आलिंगन न करेगी ॥ १९२ ॥
अरिमर्दनः पृष्टवान्,-" का च नावगूहते ? कश्चायं चौर इति विस्तरतः श्रोतुमिच्छामि" । दीप्ताक्षः कथयति-
अरिमर्दन पूछने लगा-"कौन नहीं आलिंगन करती ? कौन यह चोर है ? यह विस्तारसे सुननेकी इच्छा करता हूं"। दीप्ताक्ष कहने । लगा-
कथा ८.
अस्ति कस्मिंश्चिदधिष्ठाने कामातुरो नाम वृद्धवणिक्, तेन च कामोपहतचेतसा मृतभार्य्येण काचित्निर्द्धनवणिक्-सुता प्रभूतं धनं दत्त्वा उद्वाहिता । अथ सा दुःखाभिभूता तं वृद्धवणिकं द्रष्टुमपि न शशाक । युक्तञ्चैतत्-
किसी एक स्थानमे कामातुर नाम वृद्ध वणिक् रहता था, उसने कामसे उपहत चित्त हो भार्याके मृत होजानेसे कोई निर्धन वणिक्पुत्री बहुतसा धन देकर विवाही । वह दुःखसे व्याकुल हुई उस वृद्ध वणिकको देखनेको भी समर्थ न हुई । यह युक्तही हे-
( ३५० ) पञ्चतन्त्रम् ।
श्वेतं पदं शिरसि यत्तु शिरोरुहाणां
स्थानं परं परिभवस्य तदेव पुंसाम् ।
आरोपितास्थिशकलं परिहृत्य यान्ति
चाण्डालकूपमिव दूरतरं तरुण्यः ॥ १९३ ॥
जो कि शिरपर श्वेत बालोंका स्थान है यह पुरुषोंके तिरस्कारका परम स्थान है तरुणी चाण्डालके कूपकी समान आरोपित अस्थिखण्डकी समान उसे त्यागकर चली जाती हैं ॥ १९३ ॥
तथाच-
और देखो-
गात्रं संकुचितं गतिर्विगलिता दन्ताश्च नाशं गता
दृष्टिर्भ्राम्यति रूपमप्युपहतं वक्त्रञ्च लालायते ।
वाक्यं नैव करोति बान्धवजनः पत्नी न शुश्रूषते
धिक् कष्टं जरयाभिभूतपुरुषं पुत्रोऽप्यवज्ञायते ॥ १९४ ॥
शरीरमें झिल्ली पडी, गति हीन हुई, दांत नाशको प्राप्त हुए, दृष्टि घूमने लगी, रूप नष्ट हुआ, मुखसे लार गिरने लगी, बन्धुजन उसके वचन नहीं मानते तथा पत्नी भी नहीं सुनती । जरासे तिरस्कृत पुरुषको धिक् तथा कष्ट है कि जिसकी पुत्र भी अवज्ञा करता है ॥ १९४ ॥
अथ कदाचित् सा तेन सह एकशयने पराङ्मुखी यावत् तिष्ठति, तावद्गृहे चौरः प्रविष्टः। सा अपि तं चौरं दृष्ट्वा भयव्याकुलिता वृद्धमपि तं पतिं गाढं समालिङ्ग। सोऽपि विस्मयात् पुलकांकितसर्वगात्रः चिन्तयामास । "अहो! किमेषा मामद्य अवगूहते" । यावत् निपुणतया पश्यति, तावत् गृहकोणैकदेशे चौरं दृष्ट्वा व्यचिन्तयत । "नूनं एषा अस्य भयात् मामालिङ्गति" इति ज्ञात्वा तं चौरमाह-
एक समय जब वह उसके साथ एक ही शयनमें मुख फेरे स्थित थी उसके घरमें उस समय चोर घुसा । वह भी उस चोरको देख भयसे व्याकुल चित्त हो उस वृद्धकोही आलिंगन करती हुई । वह भी विस्मयसे सब शरीर पुलकित हो विचारने लगा । “अहो ! आज यह कैसे मुझे आलिंगन करती है” । जब
भाषाटीकासमेतम् । ( ३५१ )
अच्छी प्रकारसे देखा तो घरके एक कोनेमें चोरको देख विचारने लगा । "अवश्यही यह इसके भयसे मुझे आलिंगन करती है" ऐसा विचार चोरसे बोला-
या ममोद्विजते नित्यं सा मामद्यावगूहते ।
प्रियकारक भद्रं ते यन्ममास्ति हरस्व तत् ॥ १९५ ॥ ”
जो मुझसे सदा क्लेश मानती थी वह आज मुझे आलिंगन करती है हे प्रियकरनेवाले ! जो मेरा है उसे हरण कर ॥ १९५ ॥ ”
तत् श्रुत्वा चौरोऽपि आह-
यह सुनकर चोर भी बोला-
हर्त्तव्यं ते न पश्यामि हर्त्तव्यं चेद्भविष्यति ।
पुनरप्यागमिष्यामि यदीयं नावगूहते ॥ १९६ ॥
तेरे हरने योग्य नहीं देखताहू जो हरने योग्य होगा तो फिर आऊंगा जो यह न आलिंगन करेगी ॥ १९६ ॥
तस्मात् चौरस्यापि उपकारिणः श्रेयः चिन्त्यते, किं पुनर्न शरणागतस्य। अपि च अयं तैः विप्रकृतोऽस्माकमेव पुष्टये भविष्यति तदीयरन्ध्रदर्शनाच्चेति। अनेन कारणेन अयमवध्य" इति। एतदाकर्ण्य अरिमर्द्दनोऽन्यं सचिवं वक्रनासं पप्रच्छ,-“भद्र ! साम्प्रतमेवं स्थिते किं कर्त्तव्यम् ?” सोऽब्रवीत,-“ देव ! अवध्योऽयम् । यतः-
इस कारण उपकारी चोरका भी मगल विचारा जाता है फिर शरण आयेका तो क्या । और फिर यह उनसे तिरस्कृत हुआ हमारी पुष्टिके निमित्त ही होगा उसका रन्ध्र दिखानेको । इन कारणोंसे यह अवध्य है” । यह सुनकर अरिमर्दन दूसरे मन्त्री वक्रनाससे पूछने लगा- “भद्र ! इस स्थितिमें क्या करना चाहिये” वह बोला-“यह अवध्य है । क्यों कि-
शत्रवोऽपि हितायैव विवदन्तः परस्परम् ।
चौरेण जीवितं दत्तं राक्षसेन तु गोयुगम् ॥ १९७॥”
परस्पर विवाद करते हुए शत्रुभी हितके निमित्त होते हैं चोरने जीवन और राक्षसने दो गौ दीं ॥ १९७ ॥
( ३५२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
अरिमर्दनः प्राह,—"कथमेतत् ?" वक्रनासः कथयति—
अरिमर्दन बोला,—"यह कैसे ?" वक्रनास कहने लगा—
कथा ९.
अस्ति कस्मिंश्चिदधिष्ठाने दरिद्रो द्रोणनामा ब्राह्मणःप्रतिग्रहधनः सततविशिष्टवस्त्रानुलेपनगन्धमाल्यालङ्कारताम्बूलादिभोगपरिवर्जितः प्ररूढकेशश्मश्रुनखरोमोपचितः शीतोष्णवातवर्षादिभिः परिशोषितशरीरः । तस्य च केनापि यजमानेन अनुकम्पया शिशुगोयुगं दत्तम्। ब्राह्मणेन च बालभावात् आरभ्य याचितघृततैल्यवसादिभिः संवर्द्धयं सुपुष्टं कृतम् । तच्च दृष्ट्वा सहसा एव कश्चित् चौरः चिन्तितवान्, "अहमस्य ब्राह्मणस्य गोयुगमिदमपहरिष्यामि" । इति निश्चित्य निशायां बन्धनपाशं गृहीत्वा यावत् प्रस्थितःतावदर्द्धमार्गे प्रविरलतीक्ष्णदन्तपंक्तिः उन्नतनासावंशो प्रकटरक्तान्तनयन उपचितस्नायुसन्ततिर्नतगात्रः शुष्ककपोलः सुहुतहुतवहपिङ्गलश्मश्रुकेशशरीरः कश्चित् दृष्टः । दृष्ट्वा च तं तीव्रभयत्रस्तोऽपि चौरोऽब्रवीत्—"को भवानिति ?" स आह—"सत्यवचनोऽहं ब्रह्मराक्षसः । भवान् अपि आत्मानं निवेदयतु" सोऽब्रवीत्—"अहं क्रूरकर्मा चौरः। दरिद्रब्राह्मणस्य गोयुगं हर्तुं प्रस्थितोऽस्मिः।" । अथ जातप्रत्ययो राक्षसोऽब्रवीत्—"भद्र ! षष्ठााहकालिकोऽयं, अतः तमेव ब्राह्मणमद्य भक्षयिष्यामि । तत् सुन्दरमिदमेककार्यों एव आवाम्" । अथ तौ तत्र गत्वा एकान्ते कालमन्वेषयन्तौ स्थितौ । प्रसुप्ते च ब्राह्मणे तद्भक्षणार्थं प्रस्थितं राक्षसं दृष्ट्वा चौरोऽब्रवीत्—"भद्र ! नैष न्यायः, यतो गोयुगे मया अपहृते पश्चात् त्वमेनं ब्राह्मणं भक्षय " । सोऽब्रवीत्—" कदाचिदयं ब्राह्मणो गोशब्देन बुध्येत, तदा अनर्थकोऽयं मम आरम्भः स्यात्" । चौरोऽपि अब्रवीत्—"तव अपि यदि भक्षणाय उपस्थितस्यान्तर एकोपि
भाषाटीकासमेतम् । ( ३५३ )
अन्तरायः स्यात् तदाहमपि न शक्नोमि गोयुगमपहर्तुम्। अतः प्रथमं मया अपहृते गोयुगे पश्चात् त्वया ब्राह्मणो भक्ष- यितव्यः”। इत्थं च अहमहमिकया तयोर्विबदतोः समुत्पन्ने द्वैधे प्रतिरववशाद् ब्राह्मणो जजागार। अथ तं चौरोऽब्रवीत्- “ब्राह्मण ! त्वामेव अयं राक्षसो भक्षयितुमिच्छति”। राक्षसो- ऽपि आह- “ब्राह्मण ! चौरोऽयं, गोयुगं ते अपहर्तुमिच्छति”। एवं श्रुत्वा उत्थाय ब्राह्मणः सावधानो भूत्वा इष्टदेवतामन्त्रा- ध्यायेन आत्मानं राक्षसादुद्गूर्णलगुडेन चौरात् गोयुगं ररक्ष। अतोऽहं ब्रवीमि-
किसी स्थानमें दरिद्र द्रोणनाम ब्राह्मण प्रतिग्रह मात्र जीविकावाला निरन्तर श्रेष्ठ वस्त्रानुलेपन गंध माला अलंकार ताम्बूलादि भोगसे हीन बढेहुए केश दाढी मूंछ नखरोमसे युक्त शीत उष्ण वात वर्षासे शोषित शरीर था । उसको किसी यजमानने कृपाकर दो बछडे दिये । ब्राह्मणने उन दोनो बछडोंको बालक- पनसेही मागे हुए घी तेल घास आदिसे बढाकर पुष्ट किया । उनको देख सह- साही कोई चोर विचारने लगा— “मैं इस ब्राह्मणके दोनो बछडे चुराऊंगा” । ऐसा विचार रात्रिमें बन्धनरज्जु लेकर जब चला तब तक आधे मार्गमें पृथक् तीक्ष्ण दांतोंकी पंक्तिवाला, ऊंचे नासिका वंशसे युक्त, उज्ज्वल लाल नेत्र, पुष्ट है नाडीसमूह जिसका ऐसा, नत शरीर, सूखे कपोल, सम्यक् हुत हुए अग्निके सदृश पिङ्गल दाढी मूछों और शरीरवाला कोई देखा । देखतेही उसको बडे भयसे व्याकुल हुआभी चोर बोला,— “तुम कौनहो ?” वह बोला— “मैं सत्य वचन ब्रह्मराक्षस हूं । तुमभी अपनेको कहो”। वह बोला—“मैं क्रूर कर्मा चोर हूं। दरिद्र ब्राह्मणके दो बैल चुराने जाता हूं”। तब विश्वासको प्राप्तहो राक्षस बोला— “भद्र ! मैं छठे समय भोजन करनेवाला हूं । इस कारण आज उसी ब्राह्मणको भक्षण करूंगा। यह अच्छी बात है जो हम तुम दोनो एकही कार्यमें हैं”। तब वे दोनो वहा जाकर एकान्तमें समय देखते स्थित रहे । ब्राह्मणके सोनेपर उसके भक्षणके निमित्त जाते हुए राक्षसको देखकर चोर बोला,— “भद्र ! यह न्याय नहीं है । जो कि मेरे बैलोंको हरण करनेके पीछे तुम इस ब्राह्मणको भक्षण
२३
( ३५४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
कर जाना।” वह बोला-“जो यह ब्राह्मण गोके शब्दसे जाग जाय तो यह मेरा आरम्भ अनर्थक होजायगा”। चोर बोला,-“यदि तुम्हारे भक्षणमें कोई विघ्न उपस्थित होजावे तो मैं भी दोनो बछडोंके हरणको समर्थ न हूंगा। तब पहले मेरे गोयुगके हरण करनेके पीछे तुम ब्राह्मणको भक्षण करना”। इस प्रकार मैं पहले मैं पहले ऐसे परस्पर विवाद करते उन दोनोंके कलह उत्पन्न होनेमें शब्द होनेके कारण ब्राह्मण जाग उठा। तब उससे चोर बोला-“ब्राह्मण ! यह राक्षस तुझे खानेकी इच्छा करता है” राक्षस बोला,-“ब्राह्मण ! यह चोर तेरे दोनो बछडे चुराना चाहता है” यह सुनकर ब्राह्मण उठ सावधान हो इष्ट देवताके मन्त्र उच्चारणसे अपनेको राक्षससे और लकडी उठाकर चोरसे दोनो बछडोंकी रक्षा करता भया। इसमें मैं कहता हूं-
“शत्रवोऽपि हितायैव विवदन्तः परस्परम् । चौरेण जीवितं दत्तं राक्षसेन तु गोयुगम् ॥ १९८ ॥”
“परस्पर विवाद करते शत्रुभी हितके निमित्त होते हैं चोरने जीवित और राक्ष सने इस प्रकार दो बछडे दिये ॥ १९८ ॥”
अथ तस्य वचनमवधार्य अरिमर्दनः पुनरपि प्राकारक-र्णमपृच्छत्,-“कथय किमत्र मन्यते भवान् ?” सोऽब्रवीत्, “देव ! अवध्य एवायं, यतो रक्षितेन अनेन कदाचित् पर-स्परप्रीतया कालः सुखेन गच्छति । उक्तञ्च-
तब उसके बचनको सुन अरिमर्दन फिर प्राकारकणसे पूछने लगा-“कहो तुम इसमें क्या मानते हो ?” वह बोला,-“देव ! यह अवध्य है। जो इसकी रक्षा करनेसे कदाचित् प्रीतिसे सुखसे समय बीतेगा। कहा है-
परस्परस्य मर्माणि ये न रक्षन्ति जन्तवः । त एव निधनं यान्ति वल्मीकोदरसर्पवत् ॥ १९९ ॥
जो प्राणी परस्पर एक दूसरेके मर्मकी रक्षा नहीं करते वह वल्मीकिके और पेटके भीतर सर्पकी समान नष्ट होते हैं ॥ १९९ ॥
अरिमर्दनोऽब्रवीत्,-“कथमेतत् ?” प्राकारकणः कथयति- अरिमर्दन बोला,-“यह कैसे ?” प्राकारकण कहता है-
भाषाटीकासमेतम् । ( ३५१ )
कथा १०.
अस्ति कस्मिंश्चिन्नगरे देवशक्तिर्नाम राजा, तस्य च पुत्रो जठरवल्मीकाश्रयेण उरगेण प्रतिदिनं प्रत्यङ्गं क्षीयते। अनेकोपचारैः सद्वैद्यैः सच्छास्त्रोपदिष्टौषधयुक्त्यापि चिकित्स्यमानो न स्वास्थ्यमाप्नोति। अथ असौ राजपुत्रो निर्वेदात् देशान्तरं गतः। कस्मिंश्चिन्नगरे भिक्षाटनं कृत्वा महति देवालये कालं यापयति। अथ तत्र नगरे बलिर्नाम राजा आस्ते, तस्य च द्वे दुहितरौ यौवनस्थे तिष्ठतः। ते च प्रतिदिवसमादित्योदये पितुः पादान्तिकमागत्य नमस्कारं चक्रतुः। तत्र च एका अब्रवीत्,-“विजयस्व महाराज यस्य प्रसादात् सर्वं सुखं लभ्यते”। द्वितीया तु,-“विहितं भुङ्क्ष्व महाराज !” इति ब्रवीति। तच्छ्रुत्वा प्रकुपितो राजा अब्रवीत्,-“भो मन्त्रिन् ! एनां दुष्टभाषिणीं कुमारिकां कस्यचिद् वैदेशिकस्य प्रयच्छत येन निजविहितामियमेव भुङ्क्ते”। अथ तथेति प्रतिपद्य अल्पपरिवारा सा कुमारिका मन्त्रिभिः तस्य देवकुलाश्रितराजपुत्रस्य प्रतिपादिता। सा अपि प्रहृष्टमानसा तं पतिं देववत् प्रतिपाद्य आदाय च अन्यविषयं गता। ततः कस्मिंश्चिद्दूरतरनगरप्रदेशे तडागतटे राजपुत्रमावासरक्षायै निरूप्य, स्वयं च घृततैललवणतण्डुलादिक्रयनिमित्तं सपरिवारा गता। कृत्वा च क्रयविक्रयं यावदागच्छति, तावत् स राजपुत्रो वल्मीकोपरिकृतमूर्धा प्रसुप्तः। तस्य च मुखात् भुजगः फणां निष्क्राम्य वायुमश्नाति। तत्र एव च वल्मीकेऽपरः सर्पो निष्क्रम्य तथा एव आसीत्। अथ तयोः परस्परदर्शनेन क्रोधसंरक्तलोचनयोः मध्यात् वल्मीकस्थेन सर्पेण उक्तं,-“भोभो दुरात्मन्! कथं सुन्दरसर्वाङ्गं राजपुत्रमित्थं कदर्थयसि ?” मुखस्थोऽहिरब्रवीत्,-“भो भोः ! त्वया अपि दुरात्मना अस्य वल्मीकस्य मध्ये कथमिदं दूषितं हाटकपूर्णं कलशयुगलम्” इति।एवं पर-
( ३५६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
स्परस्य मर्माणि उद्घाटितवन्तौ।पुनः वल्मीकस्थोऽहिरब्रवीत्- “भो दुरात्मन् ! भेषजमिदं ते किं कोऽपि न जानाति। यत् जीर्णोत्कालितकाञ्जिकाराजिकापानेन भवान् विनाशमु- पयाति” । अथ उदरस्थोऽहिरब्रवीत्-“ तवापि एतद्भेषजं किं कश्चिदपि न वेत्ति :? यत् उष्णतैलेन वा महोष्णोदके- न तव विनाशः स्यादिति ” । एवञ्च सा राजकन्या विटपान्तरिता तयोः परस्परालापान् मर्ममयान् आक- र्ण्य तथा एव अनुष्ठितवती । विधाय अव्यङ्गं नीरोगं भर्त्तारं निधिञ्च परममासाद्य स्वदेशाभिमुखं प्रायात् । पितृमातृस्वजनैः प्रतिपूजिता विहितोपभोगं प्राप्य सुखेन अवस्थिता । अतोऽहं ब्रवीमि-
किसी नगरमें देवशक्ति नामवाला राजा रहता था उसका पुत्र उदररूप (१) वल्मीकमें रहनेवाले सर्पसे प्रतिदिन प्रत्यंगसे दुबला होता था, अनेक उपायोंसे सद्वैद्योँ द्वारा सच्छास्त्रोंमें कही औषधीसे युक्तभी चिकित्सा करा हुआ स्वस्थताको न प्राप्त होता । तब यह राजपुत्र निर्वेदसे देशान्तरको गया किसी एक नगरमें भिक्षाटन कर बडे देवालयमें समय बिताता था । उस नगरमे बलिनाम राजा है उसकी दो कन्या जवानथीं । वो प्रतिदिन सूर्योदयमें पिताके निकट आकर नमस्कार करती हुई । उनमेंसे एक बोली-“महाराजकी जय हो । जिसके प्रसादसे सब सुख प्राप्त होता है”। दूसरी-“महाराज ! अपने कर्मसे उत्पन्न हुआ भोगो,” ऐसा बोली । यह सुन क्रोध कर राजा बोला,-“भो ! मंत्रिन् इस दुष्ट बोलनेवाली कुमारिकाको किसी विदेशी पुरुषको दे दो । जिससे अपना किया हुआ यही भोगे” । तब “बहुत अच्छा” कहकर थोडी सखियोंके सहित वह कुमारी मंत्रियोंने उस देवमंदिरमें रहनेवाले राजपुत्रको देदी । वह भी प्रसन्नमनसे उस पतिको देववत् प्राप्त हो लेकर और देशको गई । तब किसी अत्यन्त दूर नगर देशमें सरोवरके तट राजपुत्रको स्थान रक्षाके लिये नियुक्तकर स्वयं घी तेल लवण तण्डुलादिक लेनेके निमित्त परिवार सहित गई । क्रय विक्रय कर जब आने लगी तबतक वह राजपुत्र वल्मीकके-
१ उसके पेटमें सर्प रहताथा ।
भाषाटीकासमेतम् । ( ३५७ )
ऊपर शिर धरकर सो गया । उसके मुखसे सर्प फण निकालकर वायुभक्षण करता था । उसी बाँबईसे दूसरा सर्प निकल कर भी इसी प्रकार करता । तब उनके परस्पर दर्शनसे क्रोधसे लाल नेत्र कर वल्मीकमे स्थित सर्पने कहा-“भो भो दुरात्मन् ! किस प्रकार सर्वांगसुन्दर इस राजपुत्रको क्लेश देता है ?” मुखमें स्थित सर्प बोला,-“भो ! भो ! तुम दुरात्माने भी इस वल्मीकके मध्यमें किस प्रकार यह सुवर्णसे पूर्ण दो कलश दूषित किये है ?” इस प्रकार परस्पर दोनों भेद खोलते भये । फिर वल्मीकमे स्थित सर्प बोला,-“भो दुरात्मन् ! यह तेरी औषधी क्या कोई नहीं जानता है ? जो कि पुरानी आलोदित राजकां-जीके पानसे तू नाशको प्राप्त होगा” । तब वह मुखके भीतरका सर्प बोला-“क्या तेरी यह औषधी कोई नहीं जानता है ? जो गरम जल वा गरमतेलसे तेरा नाश होगा” । इस प्रकार वह राजकन्या वृक्षकी ओरसे उन दोनोंके परस्पर भेदके वचन सुनकर, वैसाही करती हुई अव्यंग और निरोग स्वामीको करके परम धनको प्राप्त हो अपने देशको चली । पिता माता सुजनोंसे पूजित हो यथेच्छ भोगोंको प्राप्त होकर सुखसे रही । इससे मैं कहता हू-
परस्परस्य मर्माणि ये न रक्षन्ति जन्तवः ।
त एव निधनं यान्ति वल्मीकोदरसर्पवत् ॥ २०० ॥”
जो प्राणी परस्परमर्मोंकी रक्षा नहीं करते हैं वह वल्मीक और उदरके सर्पकी समान नष्ट होते हैं॥ २०० ॥”
तच्च श्रुत्वा स्वयमरि मर्दनोऽपि एवं समर्थितवान् । तथाच अनुष्ठितं दृष्ट्वान्तर्लीनं विहस्य रक्ताक्षः पुनरब्रवीत्,— “कष्टम् ! विनाशितोऽयं भवद्भिः अन्यायेन स्वामी । उक्तञ्च-
यह सुनकर स्वयं अरिमर्दन भी इस बातको पुष्ट करता हुआ इस प्रकार ( शरणागत रक्षा ) के अनुष्ठानको देखकर अस्पष्ट स्वरसे हँसकर रक्ताक्ष फिर बोला,-“कष्ट है कि तुमने अन्यायसे स्वामीका नाश किया । कहा है-
अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूज्यानान्तु विमानना ।
त्रीणि तत्र प्रवर्त्तन्ते दुर्भिक्षं मरणं भयम् ॥ २०१ ॥
जहा अपूज्य पूजे जाते हैं पूज्योंका निरादर होता है वहा तीन होते हैं दुर्भिक्ष, मरण और भय ॥ ३०१ ॥
| ( ३५८ ) | पञ्चतन्त्रम् । |
|---|
तथाच-
और देखो-
प्रत्यक्षेऽपि कृते पापे मूर्खः साम्ना प्रशाम्यति ।
रथकारः स्वकां भार्य्यां सजारां शिरसाऽऽवहत् ॥२०२॥”
प्रत्यक्ष दोष होनेपर भी ( पापीकी ) विनयसे मूर्ख शान्त होता है रथकारने अपनी भार्याको जारसहित शिरपर उठाया ॥ २०२ ॥”
मन्त्रिणः प्राहुः-“कथमेतत् ?” रक्ताक्षः कथयति-
मंत्री बोले,-“यह कैसे ?” रक्ताक्ष कहता है-
कथा ११.
अस्ति कस्मिंश्चिदधिष्ठाने वीरधरो नाम रथकारः, तस्य भार्या कामदमनी । सा च पुंश्चली जनापवादसंयुक्ता । सोऽपि तस्याः परीक्षणार्थं व्यचिन्तयत् ।-“अथ मया अस्याः परीक्षणं कर्त्तव्यम् । उक्तञ्च यतः-
किसी एक स्थानमें वीरधर नामवाला बढई रहता है । उसकी भार्या कामदमनी । वह व्यभिचारिणी लोकापवादसे युक्तथी । वह भी उसकी परीक्षा करनेका विचार करताथा कि “किस प्रकारमें इसकी परीक्षा करूं । कहाहै-
यदि स्यात्पावकः शीतः प्रोष्णो वा शशलाञ्छनः ।
स्त्रीणां तदा सतीत्वं स्याद्यदि स्याद्दुर्जनो हितः ॥२०३॥
यदि अग्नि शीतल होजाय वा चन्द्रमा गरम होजाय वा दुर्जन हित होजाय तो स्त्रियोंके सतीपनका विश्वास हो ॥ २०३ ॥
जानामि च एनां लोकवचनात् असतीम् । उक्तञ्च-
लोकप्रवादसे मैं इसको असती जानता हूं । कहा है-
यच्च वेदेषु शास्त्रेषु न दृष्टं न च संश्रुतम् ।
तत्सर्वं वेत्ति लोकोऽयं यत्स्याद्ब्रह्माण्डमध्यगम् ॥ २०४ ॥
जो वेदशास्त्रमें न देखा न सुना है और जो कुछ इस संसारके मध्यमें स्थित है उसको स्त्री लोक सब जानते हैं ॥ २०४ ॥
एवं सम्प्रधार्य भार्यामवोचत्-“प्रिये ! प्रभातेऽहं ग्रामान्तरं यास्यामि । तत्र कतिचिद्दिनानि लगिष्यन्ति । तत
भाषाटीकासमेतम् । ( ३५९ )
त्वया किमपि पाथेयं मम योग्यं विधेयम्” । सापि तद्वचनं श्रुत्वा हर्षितचित्ता औत्सुक्यात् सर्वकार्याणि सन्त्यज्य सिद्धमन्नं घृतशर्कराप्रायमकरोत् । अथवा साधु इदमुच्यते-
ऐसा विचार कर भार्यामे बोला-“प्रिये ! प्रभात समयमें ग्रामान्तरको जाऊं- गा वहा कुछ दिन लगेंगे सो तू कुछ भोजनादि बनादे”। वह भी यह वचन सुन बडे हर्षित चित्तसे उत्कठासे सब कार्य त्याग कर सिद्ध अन्न ( पूरी आदि ) घृत शर्करासे युक्त बनाती हुई । अथवा यह अच्छा कहा है-
दुर्दिवसे घनतिमिरे वर्षति जलदे महाटवीप्रभृतौ । पत्युर्विदेशगमने परमसुखं जघनचपलायाः ॥ २०५ ॥
दुर्दिन घने अन्धकारमें मेघके वर्षनेमें महाजगलमें पतिके विदेश जानेमें चपल जघावाली ( कामिनी ) परम सुख मानती है ॥ २०५ ॥
अथ असौ प्रत्यूषे उत्थाय स्वगृहात् निर्गतः । सापि तं प्रस्थितं विज्ञाय प्रहसितवदना अङ्गसंस्कारं कुर्वाणा कथञ्चित् तद्दिवसमत्यवाहयत् । अथ पूर्वपरिचितविटगृहे गत्वा तं प्रत्यु- क्तवती । स दुरात्मा मे पतिर्ग्रामान्तरं गतः । तत् त्वया अ- स्मद्गृहे प्रसुप्ते जने समागन्तव्यम् । तथा अनुष्ठिते स रथका- रोऽरण्ये दिनमतिवाह्य प्रदोषे स्वगृहेऽपरद्वारेण प्रविश्य शय्या- धस्तले निभृतो भूत्वा स्थितः । एतस्मिन्नन्तरे स देवदत्तः समागत्य तत्र शरणे उपविष्टः । तं दृष्ट्वा रोषाविष्टचित्तो रथ- कारो व्यचिन्तयत् “किमेनं उत्थाय हन्मि, अथवा हेलया एव प्रसुप्तौ द्वौ अपिएतौ व्यापादयामि । परं पश्यामि ताव- दस्याः चेष्टितम् । शृणोमि च अनेन सह आलापान् ”। अत्रा- न्तरे सा गृहद्वारं निभृतं विधाय शयनतलमारूढा । अथ त- स्यास्तत्र आरोहन्त्या रथकारशरीरे पादो विलग्नः । ततः सा व्यचिन्तयत् । “नूनमेतेन दुरात्मना रथकारेण मत्परीक्ष- णार्थं भाव्यम् । ततः स्त्रीचारित्रविज्ञानं किमपि करोमि”। एवं तस्याः चिन्तयन्त्या स देवदत्तः स्पर्शोत्सुको बभूव । अथ तया कृताञ्जलिपुटया अभिहितं-“भो महानुभाव ! न मे शरीरं त्वया
( ३६० ) पञ्चतन्त्रम् ।
स्पर्शनीयं यतोऽहं पतिव्रता महासती च। न चेत् शापं दत्त्वा त्वां भस्मसात करिष्यामि”। स आह- “यदि एवं तर्हि त्वया किमहमाहूतः?” सा अब्रवीत्,- “भो ! शृणुष्व एकाग्रमनाः। अहमद्यप्रत्यूषे देवतादर्शनार्थं चण्डिकायतनं गता, तत्र अक- स्मात् खे वाणी सञ्जाता- “पुत्रि ! किं करोमि, भक्तासि मे त्वं, परं षण्मासाभ्यन्तरे विधिनियोगाद् विधवा भवि- ष्यसि”। ततो मया अभिहितं,- “भगवति ! यथा त्वम् आपदं वेत्सि, तथा तत्प्रतीकारमपि जानासि । तत् अस्ति कश्चिदुपायो येन मे पतिः शतसंवत्सरजीवी भवति ?” । ततः तया अभिहितम्- “वत्से ! सन्नपि नास्ति । यतः तव आयत्तः स प्रतीकारः” तच्छ्रुत्वा मया अभिहितम्,- “देवि ! यदि तत् मम प्राणैर्भवति, तत् आदिशय येन करोमि”। अथ देव्या अभिहितम्,- “यदि अद्यदिने परपुरुषेण सह एकस्मिन् शयने समारुह्य आलिङ्गनं करोषि, तत् एव भर्तृ- सक्तोऽपमृत्युः तस्य सञ्चरति भर्त्तापि पुनः वर्षशतं जीवति”। तेन त्वं मया अभ्यर्थितः । तद्यत किञ्चित कर्तुमनाः तत् कुरुष्व । न हि देवतावचनमन्यथा भविष्यति । इति निश्चयः”। ततोऽन्तर्हासविकाशमुखः स तदुचितमाचचार । सोऽपि रथकारो मूर्खः तस्याः तद्वचनमाकर्ण्य पुलकाङ्किततनुः शय्याधस्तलात् निष्क्रम्य तामुवाच,- “साधु पतिव्रते ! साधु कुलनन्दिनि अहं दुर्जनवचनशंकितहृदयः त्वत्परीक्षानिमित्तं ग्रामान्तरव्याजं कृत्वा अत्र खट्वाधस्तले निभृतं लीनः । तत एहि आलिङ्गय मां, त्वं स्वभर्त्तृभक्तानां मुख्या नारीणां यत् एव ब्रह्मव्रतं परसङ्गेऽपि पालितवती । मदायूर्वृद्धिकृतेऽपमृ- त्युविनाशार्थञ्च त्वमेवं कृतवती”। तामेवमुक्ता सस्नेहमालि- ङ्गितवान् । स्वरुस्कन्धे तां आरोप्य तमपि देवदत्तमुवाच,- “भो महानुभाव ! मत्पुण्यैः त्वमिह आगतः, त्वत्प्रसादात मया प्राप्तं वर्षशतप्रमाणमायुः। तत् त्वमपि मामालिङ्गय मत-
भाषाटीकासमेतम् । ( ३६१ )
स्कन्धे समारोह” । इति जल्पन् अनिच्छन्तमपि देवदत्त- मालिङ्ग्य बलात् स्वकीयस्कन्धे आरोपितवान् । ततश्च नृत्यं कृत्वा,- “हे ब्रह्मव्रतधराणां धुरीण ! त्वयापि मयि उपकृतं” इत्यादि उक्त्वा स्कन्धात् उत्तार्य्य, यत्र यत्र स्वजनगृहद्वारा- दिषु बभ्राम, तत्र तत्र तयोः उभयोरपि तद्गुणवर्णनमकरोत्। अतोऽहं ब्रवीमि-
तब वह सबेरेही उठकर अपने घरसे निकला। वहभी उसको गया जान शृङ्गारकर किसी प्रकार दिन बिताती हुई और पूर्वपरिचित जारके घर जाकर उससे मिली ( बोली ) -“वह दुरात्मा मेरा पति ग्रामान्तरको गया है तू हमारे घर जनोंके सोजानेपर आजाना” । वैसाही हुआ । और वह रथकार वनमेंही दिन व्यतीतकर रात्रिको अपने घरमें दूसरे द्वारसे प्रवेश कर सेजके नीचे मौन होकर स्थित हुआ । इसी समय देवदत्त ( जार ) आकर उस सेजपर आया । उसको देख क्रोधपूर्णचित्त बढई विचारने लगा “क्या इसको उठकर मारू अथवा लीलासे सोते हुए दोनोंहीको मारू । अच्छा इनकी चेष्टा तो देखूं । इनके साथकी बात सुनूं” । इसी समय वह घरका दरवाजा मूदकर सेजपर आरूढ हुई । तब उसके उसपर चढनेमे रथकारके शरीरमें पाव लगा । तब वह विचारने लगी “अवश्य यह दुरात्मा रथकार मेरी परीक्षाके निमित्त स्थित है सो कोई स्त्रीचरित्रका कौशल करू” । इस प्रकार उसके विचारनेपर वह देवदत्त उसके स्पर्शमें उत्कण्ठित हुआ । तब उसने हाथ जोडकर कहा-“भो ! महानुभाव ! तुम मेरा शरीर मत छुओ, जो कि मैं पतिव्रता महा सती हू । नहीं तो शाप देकर तुमको भस्म कर दूंगी” । वह बोला,-“जो ऐसा है तो तैने मुझे क्यों बुलाया ?” । वह बोली-“भो ! एकाग्र मनसे सुनो । मैं आज सबेरे देवता दर्शनको चण्डीके मन्दिरमें गई वहां अकस्मात् आकाशवाणी हुई-“पुत्री ! मैं क्या करू तू मेरी भक्त है परन्तु छः महीनेके बीचमें प्रारब्धके कारण तू विधवा होगी” तब मैंने कहा-“भगवति ! जो तू आपत्तिको जानती है, तो उसका निवारणभी जानती है क्या है ऐसा कोई उपाय है जिससे मेरा पति सौ वर्षतक जिये ?” । तब उसने कहा-“वत्से ! होता हुआभी नहीं है । क्यों कि उसका उपाय तेरे अधीन है”। यह सुनकर मैंने कहा,-“देवि ! यदि
( ३६२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
वह मेरे प्राणोंसेभी हो, तो आज्ञा दे जिससे मैं करूं”। तब देवीने कहा जो आजके दिन परपुरुषके साथ एक खाटपर आरूढ हो आलिंगन करे तो तेरे भर्त्ताकी अपमृत्यु उस परपुरुषमें चली जाय तेरा भर्त्ताभी फिर सौवर्षतक जिये ” । इस कारण मैने तुमको बुलाया है । सो जो कुछ करनेकी इच्छा हो सो कर । देवताका वचन अन्यथा न होगा यह निश्चय है,” तब भीतर हँसीसे खिले मुखवाला यह उससे उचित आचरण करता हुआ । वह मूर्ख रथकारभी उसके वचन सुन पुलकित शरीर हो शय्याके नीचेसे निकल उससे बोला,–“धन्य पतिव्रते धन्य ! कुलकी आनन्द देनेवाली धन्य ! मैं दुर्जनोंके वचनोंसे शंकित हृदयहो तेरी परीक्षाके निमित्त ग्रामान्तर जानेका बहाना करके इस खाटके नीचे एकान्तमें छिपगया था । सो आ मुझे आलिंगन कर, तू अपने स्वामीकी भक्ति करनेवाली स्त्रियोंमें मुख्य है ऐसा तप-रूप व्रत परपुरुषके संग करती हुई । मेरी आयुके बढानेके निमित्त तथा अपमृत्यु नाशके निमित्त तैने ऐसा किया” । उससे ऐसा कह स्नेहसे आलिंगन करता हुआ अपने कन्धेपर उसे चढाकर उस देवदत्तसे बोला–“भो महानुभाव ! मेरे पुण्यसे तुम यहां आये तुम्हारे प्रसादसे मैंने सौ वर्षकी आयु प्राप्त की । सो तू भी मुझे आलिंगन कर मेरे कन्धेपर चढ” । ऐसा कह नहीं इच्छा करनेपरभी देवदत्तको आलिंगन कर बलसे अपने कन्धेपर चढाता हुआ । फिर नृत्य करके हे ब्रह्मव्रत धारण करनेवालोंमें अग्रणी तुमनेभी मेरा उपकार किया ऐसा कह कर कन्धेसे उतार जहां तहां अपने स्वजनोंके गृहद्वारमें घूमने लगा । वहां वहां उन दोनोंके ही उन गुणोंका वर्णन करता भया । इससे मैं कहताहूं कि–
प्रत्यक्षेऽपि कृते पापे मूर्खः साम्ना प्रशाम्यति ।
रथकारः स्वकां भार्य्यां सजारां शिरसावहत् ॥ २०६ ॥
कि पाप देखकर भी मूर्ख साम उपायसे शान्त हो जाता है रथकारने ( इस प्रकार ) जारसहित अपनी भार्याको शिरपर उठाया ॥ २०६ ॥
तत सर्वथा मूलोत्खाता वयं विनष्टाः स्मः। सुष्ठु खलु इदमुच्यते–