भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ३५१ )

अच्छी प्रकारसे देखा तो घरके एक कोनेमें चोरको देख विचारने लगा । "अवश्यही यह इसके भयसे मुझे आलिंगन करती है" ऐसा विचार चोरसे बोला-

या ममोद्विजते नित्यं सा मामद्यावगूहते ।
प्रियकारक भद्रं ते यन्ममास्ति हरस्व तत् ॥ १९५ ॥ ”

जो मुझसे सदा क्लेश मानती थी वह आज मुझे आलिंगन करती है हे प्रियकरनेवाले ! जो मेरा है उसे हरण कर ॥ १९५ ॥ ”

तत् श्रुत्वा चौरोऽपि आह-

यह सुनकर चोर भी बोला-

हर्त्तव्यं ते न पश्यामि हर्त्तव्यं चेद्भविष्यति ।
पुनरप्यागमिष्यामि यदीयं नावगूहते ॥ १९६ ॥

तेरे हरने योग्य नहीं देखताहू जो हरने योग्य होगा तो फिर आऊंगा जो यह न आलिंगन करेगी ॥ १९६ ॥

तस्मात् चौरस्यापि उपकारिणः श्रेयः चिन्त्यते, किं पुनर्न शरणागतस्य। अपि च अयं तैः विप्रकृतोऽस्माकमेव पुष्टये भविष्यति तदीयरन्ध्रदर्शनाच्चेति। अनेन कारणेन अयमवध्य" इति। एतदाकर्ण्य अरिमर्द्दनोऽन्यं सचिवं वक्रनासं पप्रच्छ,-“भद्र ! साम्प्रतमेवं स्थिते किं कर्त्तव्यम् ?” सोऽब्रवीत,-“ देव ! अवध्योऽयम् । यतः-

इस कारण उपकारी चोरका भी मगल विचारा जाता है फिर शरण आयेका तो क्या । और फिर यह उनसे तिरस्कृत हुआ हमारी पुष्टिके निमित्त ही होगा उसका रन्ध्र दिखानेको । इन कारणोंसे यह अवध्य है” । यह सुनकर अरिमर्दन दूसरे मन्त्री वक्रनाससे पूछने लगा- “भद्र ! इस स्थितिमें क्या करना चाहिये” वह बोला-“यह अवध्य है । क्यों कि-

शत्रवोऽपि हितायैव विवदन्तः परस्परम् ।
चौरेण जीवितं दत्तं राक्षसेन तु गोयुगम् ॥ १९७॥”

परस्पर विवाद करते हुए शत्रुभी हितके निमित्त होते हैं चोरने जीवन और राक्षसने दो गौ दीं ॥ १९७ ॥