भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ३५७ )

ऊपर शिर धरकर सो गया । उसके मुखसे सर्प फण निकालकर वायुभक्षण करता था । उसी बाँबईसे दूसरा सर्प निकल कर भी इसी प्रकार करता । तब उनके परस्पर दर्शनसे क्रोधसे लाल नेत्र कर वल्मीकमे स्थित सर्पने कहा-“भो भो दुरात्मन् ! किस प्रकार सर्वांगसुन्दर इस राजपुत्रको क्लेश देता है ?” मुखमें स्थित सर्प बोला,-“भो ! भो ! तुम दुरात्माने भी इस वल्मीकके मध्यमें किस प्रकार यह सुवर्णसे पूर्ण दो कलश दूषित किये है ?” इस प्रकार परस्पर दोनों भेद खोलते भये । फिर वल्मीकमे स्थित सर्प बोला,-“भो दुरात्मन् ! यह तेरी औषधी क्या कोई नहीं जानता है ? जो कि पुरानी आलोदित राजकां-जीके पानसे तू नाशको प्राप्त होगा” । तब वह मुखके भीतरका सर्प बोला-“क्या तेरी यह औषधी कोई नहीं जानता है ? जो गरम जल वा गरमतेलसे तेरा नाश होगा” । इस प्रकार वह राजकन्या वृक्षकी ओरसे उन दोनोंके परस्पर भेदके वचन सुनकर, वैसाही करती हुई अव्यंग और निरोग स्वामीको करके परम धनको प्राप्त हो अपने देशको चली । पिता माता सुजनोंसे पूजित हो यथेच्छ भोगोंको प्राप्त होकर सुखसे रही । इससे मैं कहता हू-

परस्परस्य मर्माणि ये न रक्षन्ति जन्तवः ।
त एव निधनं यान्ति वल्मीकोदरसर्पवत् ॥ २०० ॥”

जो प्राणी परस्परमर्मोंकी रक्षा नहीं करते हैं वह वल्मीक और उदरके सर्पकी समान नष्ट होते हैं॥ २०० ॥”

तच्च श्रुत्वा स्वयमरि मर्दनोऽपि एवं समर्थितवान् । तथाच अनुष्ठितं दृष्ट्वान्तर्लीनं विहस्य रक्ताक्षः पुनरब्रवीत्,— “कष्टम् ! विनाशितोऽयं भवद्भिः अन्यायेन स्वामी । उक्तञ्च-

यह सुनकर स्वयं अरिमर्दन भी इस बातको पुष्ट करता हुआ इस प्रकार ( शरणागत रक्षा ) के अनुष्ठानको देखकर अस्पष्ट स्वरसे हँसकर रक्ताक्ष फिर बोला,-“कष्ट है कि तुमने अन्यायसे स्वामीका नाश किया । कहा है-

अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूज्यानान्तु विमानना ।
त्रीणि तत्र प्रवर्त्तन्ते दुर्भिक्षं मरणं भयम् ॥ २०१ ॥

जहा अपूज्य पूजे जाते हैं पूज्योंका निरादर होता है वहा तीन होते हैं दुर्भिक्ष, मरण और भय ॥ ३०१ ॥