भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ३६५ )

ऊंचे नीचे शिलातलमें गिरनेके जलसे शब्दायमान, उसके श्रवणमात्रसे व्याकुल मत्स्योंके कूदने आदिसे प्रगट श्वेतफेनसे मिश्रित तरंगवाली गंगाके तटमें जप नियम तप स्वाध्याय व्रत योग क्रिया अनुष्ठानमें परायण विशुद्ध अल्प जलोंके ग्रहणकी इच्छावाले कन्द मूल फल शैवल (सिवार) के भक्षण से क्लेशित शरीरवाले वल्कल (वृक्षकी छाल) की बनाई कौपीन मात्रसे शरीर ढकनेवाले तपस्वियोंसे युक्त आश्रम (तपोवन) स्थान है । वहां याज्ञवल्क्यनाम कुलपति (तपस्वियोंके स्वामी) रहते थे । उनके गंगाजीमें स्नानकर आचमन करनेको आरम्भ करते हुए हाथमें श्येनके मुखसे गिरी एक मूषिका आपडी । उसे देख वटपत्रमें रखकर फिर स्नान आचमन कर (अपवित्र स्पर्शसे उत्पन्न हुई) प्रायश्चित्त क्रियाको कर, उस मूषिकाको अपने तपोबलसे कन्या बनाय अपने आश्रममे लेआये । और सन्तान रहित अपनी स्त्रीसे बोले—“भद्रे ? ग्रहण करो यह तुम्हारी पुत्री उत्पन्न हुई है यत्नसे इसे बढाओ” । तब उससे बढाई लालन पालन की हुई वह जब बारह वर्षकी हुई तब विवाहके योग्य उसको देखकर वह जाया स्वामीसे बोली—“भो स्वामिन् ! आप क्या नहीं जानते ? कि यह इस कन्याके विवाहका समय बीतता है। यह (याज्ञवल्क्य) बोले—“तुमने सत्य कहा । काहाभी है—

स्त्रियः पूर्वं सुरैर्भुक्ताः सोमगन्धर्ववह्निभिः ।
भुञ्जते मानुषाः पश्चात्तस्माद्दोषो न विद्यते ॥ २१० ॥

पहले स्त्रियें देवतोंसे भोगी जाती हैं, जो सोम गंधर्व और अग्नि नामवाले देवता हैं, पीछे मनुष्य भोगते हैं इस कारण दोष नहीं है ( १ ) ॥ २१० ॥

सोमस्तासां ददौ शौचं गन्धर्वाः शिक्षितां गिरम् ।
पावकः सर्वमेध्यत्वं तस्मान्निष्कल्मषाः स्त्रियः ॥ २११ ॥

चन्द्रमाने उनको भोगमें पवित्रता, गन्धर्वोंने शिक्षित वाणी और अग्निने सर्वाङ्गमें उनको पवित्रता दीहै, इस कारण स्त्रियें पापरहित हैं ॥ २११ ॥

असम्प्राप्तरजा गौरी प्राप्ते रजसि रोहिणी ।
अव्यञ्जना भवेत्कन्या कुचहीना च नग्निका ॥ २१२ ॥


१ हमारा बनाया दयानन्द तिमिरभास्कर देखो ।