भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 386, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 386

भाषाटीकासमेतम् । ( ३७१ )

प्रत्याह-“अहो ! मूर्खोऽयं मन्त्रिजनो भवांश्च इति एवमहमवगच्छामि । उक्तञ्च-

सो यदि यह उनका वचन करते तो थोडासा भी अनर्थ इनका न होता”। तब दुर्गद्वारको प्राप्त होकर अरिमर्दन बोला-“भो ! हितकारी इस स्थिरजीवीको जहा चाहे वहा स्थान दो” । यह सुनकर स्थिरजीवी विचारने लगा । “मुझे तो इनके वधका उपाय करना है । सो मध्यमें रहनेसे वह मुझसे सिद्ध न होगा, कारण कि यह मेरी चेष्टादिकका विचार कर सावधान हो जायगे । सो दुर्गद्वारमें स्थित होकर आपना अभिप्राय सिद्ध करू” । ऐसा विचार उलूकपतिसे बोला-“देव युक्त ही हे यह जो स्वामीने कहा है । परन्तु मैंभी नीतिशास्त्रका ज्ञाता तुम्हारा अहित हू । यद्यपि तुममे प्रीतिमान् और पवित्र हू तथापि दुर्गके मध्यमें रहना उचित नहीं । सो मैं यहा दुर्गके द्वारमें स्थित हुआही प्रतिदिन स्वामीके चरणकमलकी रजसे पवित्र शरीरवाला सेवा करूंगा” । बहुत अच्छा ऐसा कहने पर प्रतिदिन उलूकपतिके सेवक वे सम्यक् आहार करके उलूक राजकी आज्ञासे प्रचुर मास भोजन स्थिरजीवीको देते । तब कितने एक दिनोमें मयूरकी समान बलवान् हुआ । तब रक्ताक्ष स्थिरजीवीको पुष्ट देखकर विस्मयपूर्वक मत्रिजन और राजासे बोला-“अहो ! मत्रिजन और तुम सब मूर्ख हो ऐसा मैं जानता हू । कहा है-

पूर्वं तावदहं मूर्खो द्वितीयः पाशबन्धकः । ततो राजा च मन्त्री च सर्वं वै मूर्खमण्डलम् ॥ २२३ ॥

पहले तो मैं मूर्ख, दुसरे पाशबंधक, फिर राजा और मंत्री सबही मूर्ख मडल है ॥ २२३ ॥”

ते प्राहुः,-“कथमेतत् ?” रक्ताक्षः कथयति- वे बोले-“यह कैसी कथा ?” । रक्ताक्ष कहने लगा-

कथा १३.

अस्ति कस्मिंश्चित् पर्वतैकदेशे महान् वृक्षः । तत्र च सिम्भुकनामा कोऽपि पक्षी प्रतिवसति स्म । तस्य पुरीषे सुवर्णमुत्पद्यते । अथ कदाचित् तमुद्दिश्य व्याधः कोऽपि समाययौ । स च पक्षी तदग्रत एव पुरीषमुत्ससर्ज । अथ पातस-