पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ३७३ )
विचार करने लगा इस विपद्युक्त पक्षीको लेकर मैं क्या करूं । जो कदाचित् कोई इसको ऐसा जानकर राजासे निवेदन करे तो अवश्यही मेरा प्राण संदेह उपस्थित होगा । इससे स्वयंही पक्षीको राजाके पास लेजाकर निवेदन करूं” । ऐसा विचार कर वही करता हुआ । राजाभी उस पक्षीको देख खिले नयनकमल मुखवाला परमसंतोषको प्राप्त हुआ बोला, भी—“अहो रक्षा पुरुषो ! इस पक्षीको यत्नसे रक्षा करो भोजनपानादिक इसको यथेच्छ दो” । तब मंत्रीने कहा—“यह विश्वासके अयोग्य व्याधके वचनसे इस पक्षीको ग्रहण करनेसे क्या है । क्या कहीं पक्षीके पुरीषमें सुवर्ण हो सक्ता है? सो पंजरके बंधनसे इस पक्षीको छोडदे” । इस प्रकार मंत्रीके वचनसे छोडा हुआ यह पक्षी ऊंची द्वारकी तोरण पर बैठकर सुवर्णमयी बीट करके “ पहले मैं मूर्ख ” इस श्लोकको पढता हुआ यथासुख आकाशमें चलागया । इससे मैं कहताहू कि-
पूर्वं तावदहं मूर्खो द्वितीयः पाशबन्धकः ।
ततो राजा च मन्त्री च सर्वं वै मूर्खमण्डलम् ॥ २२४ ॥ ’
पहले मैं मूर्ख दूसरा पाशबंधक फिर राजा और मत्री सबही मूर्खोंका मंडल है ॥ २२४॥ ”
अथ ते पुनरपि प्रतिकूलदैवतया हितमपि रक्ताक्षवचनमनादृत्य भूयस्तं प्रभूतमांसादि विविधा हारेण पोषयामासुः। अथ रक्ताक्षः स्ववर्गमाहूय रहः प्रोवाच,—“अहो ! एतावदेव अस्मद् भूपतेः कुशलं दुर्गञ्च । तदुपदिष्टं मया यत् कुलक्रमागतः सचिवोऽभिधत्ते । तद्द्रयमन्यत् पर्वतदुर्गं सम्प्रति समाश्रयामः । उक्तञ्च यतः—
वे फिरभी प्रतिकूल दैवत होनेसे रक्ताक्षके वचन अनादर करके फिरभी उसको अनेक मासके आहारसे पुष्ट करते हुए । तब रक्ताक्ष अपने ओरके ( उल्लुओं ) को बुलाकर एकान्तमें बोला,—“अहो ! यहींतक हमारे राजाकी कुशल और दुर्गकी स्थितिहै । वह उपदेश दिया जो कुल क्रमसे आय हुआ मन्त्री उपदेश करता है । सो इस समय हम दूसरे पर्वत दुर्ग का आश्रय करेंगे कहा है कि—