पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ३७६ )
गुहा अस्य समागतस्य सदा समाह्वानं करोति । परं अद्य मद्भयात् न किञ्चिद् ब्रूते । अथवा साधु इदमुच्यते–
किसी एक वनके निकट तीक्ष्ण नखवाला सिंह रहताथा । वह कदाचित् इधर उधर घूमता क्षुधासे शुष्ककंठ किसी जीवको भी प्राप्त न करता हुआ । तब सूर्यास्तके समयमें बडी गिरिगुहाको प्राप्त हो उसमें प्रवेश कर विचारने लगा । “अवश्य इस गुहामें रात्रीके समय कोई जीव आवेगा । सो निस्तब्ध होकर बैठूं” । इसी समय उसका स्वामी दधिपुच्छ (दहीकी समान श्वेत पूंछ-वाला) नामक शृगाल आया, वह ज्योंही देखता है त्योंही सिंहके पगचिन्ह गुहामें प्रवेश कर गये हैं नकि निकलेके । तब विचारने लगा । “अहो मैं नष्ट हुआ । अवश्यही इसके भीतर सिंह है । सो क्या करूं ? कैसे जानू ?” ऐसा विचार कर द्वारसे पुकारने लगा “अहो बिल ! अहो बिल !” ऐसा कह मौन हो फिर भी उसी प्रकार बोला–“भो ! क्या भूलगई जो मेरे साथ तैने प्रतिज्ञा की थी । जो कि मैं बाहरसे आकर तुझको पुकारा करूंगा । तब तू मुझे बुलाया करना । सो यदि मुझको नहीं बुलाती है तो मैं दूसरे बिलको जाताहूं” । यह सुनकर सिंह विचारने लगा “अवश्य यह गुहा इसके आनेपर सदा बुलाया करती है परन्तु आज मेरे भयसे कुछ नहीं बोलती । अथवा अच्छा कहा है–
भयसन्त्रस्तमनसां हस्तपादादिकाः क्रियाः ।
प्रवर्त्तन्ते न वाणी च वेपथुश्चाधिको भवेत् ॥ २२६ ॥
भयसे व्याकुल मनवालोंकी हस्त पादादिक क्रिया तथा वाणी प्रवृत्त नहीं होती और कंप अधिक होता है ॥ २२६ ॥
तत् अहमस्य आह्वानं करोमि येन तदनुसारेण प्रविष्टोऽयं मे भोज्यतां यास्यति । एवं सम्प्रधार्य्य सिंहः तस्याह्वानमकरोत् । अत्र सिंहशब्देन सा गुहा प्रतिरवसम्पूर्णा अन्यान् अपि दूरस्थान् अरण्यजीवान् त्रासयामास । शृगालोऽपि पलायमान इमं श्लोकमपठत्–
सो मैं इसको पुकारूं । जिससे यह उसका अनुसरण कर इसमें प्रवेश कर मेरे भोजनको प्राप्त होगा । सो ऐसा विचार कर सिंहने उसका आह्वान किया ।