पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (३८१)
रूपवान् अतिवली कुन्तीपुत्र (नकुल सहदेव) गोपालनकें कर्ममें क्या विराट नगरमें दास न हुए ? ॥ २३८॥
रूपेणाप्रतिमेन यौवनगुणैः श्रेष्ठे कुले जन्मना
कान्त्या श्रीरिव यात्र सापि विदशां कालक्रमादागता।
सैरन्ध्रीति सगर्वितं युवतिभिः साक्षेपमज्ञातया
द्रौपद्या ननु मत्स्यराजभवने घृष्टं न किं चन्दनम् २३९॥”
इस जगतमें जो लक्ष्मीकी समान अप्रतिमरूप, स्थिर यौवन गुण, तथा श्रेष्ठ कुलके जन्म और कान्तिसे प्रकाशित थी, वहभी नारी कालवशसे विपरीत अवस्थाको प्राप्त होगई (मत्स्यराजके भवन) की गर्वीली स्त्रियोंके अहंकारभरे सैरन्ध्री (नायन) ऐसे तिरस्कारके वचन अज्ञातवासवाली द्रौपदीने विराटभवनमें सुनते हुए क्या चंदन नहीं घिसा (किन्तु घिसाही) ॥ २३९ ॥”
मेघवर्ण आह,-“ तात ! असिधाराव्रतमिदं मन्ये यत् अरिणा सह संवासः” । सोऽब्रवीत्-“ देव ! एवमेतत् परं न तादृङ्मूर्खसमागमः क्वापि मया दृष्टः। न च महाप्रज्ञमनेकशास्त्रेषु अप्रतिमबुद्धिं रक्ताक्षं विना धीमान् यत्कारणं तेन मदीयं यथावस्थितं चित्तं ज्ञातव्यम् । ये पुनः अन्ये मन्त्रिणस्ते महामूर्खा मन्त्रिमात्रव्यपदेशोपजीविनोऽतत्त्वकुशला यैः इदमपि न ज्ञातम् । यतः-
मेघवर्णबोला,-“तात ! यह तो मै असिधारा व्रत मानताहू जो शत्रुके संग निवास करना है” वह बोला,-“ देव ! ऐसेही है परन्तु ऐसा मूर्ख समागम मैने कहीं नहीं देखा और न महापाण्डित अनेक शास्त्रोंमें अलौकिक बुद्धिमान् रक्ताक्षके बिना कोई विद्वान् देखा । कारण कि उसने ज्योंकी त्यों मेरे चित्तकी अवस्था जानली । और जो उसके मंत्री थे वे महामूर्ख मंत्रिमात्रके व्यपदेशसे जीनेवाले तत्त्वज्ञानसे हीन थे जिन्होंने यह भी न जाना । जिससे-
अरितोऽभ्यागतो भृत्यो दुष्टस्तत्सङ्गतत्परः ।
अपसर्प्यः स धर्मत्वान्नित्योद्वेगी च दूषितः ॥ २४० ॥
शत्रुपक्षसे आयाहुआ भृत्य तथा शत्रुके साथ रहनेमें उत्साही दुष्ट नीतिके