पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३८० ) पञ्चतन्त्रम् ।
दर्वीव्यग्रकरेण धूममलिनेनायासयुक्तेन च भीमेनातिबलेन मत्स्यभवने किं नोषितं सूदवत् ॥ २३५ ॥
हे राजन् ! समयकी अपेक्षा करनेवाले समर्थ विद्वानकोभी वाणीरूपी वज्रसे विषम क्षुद्र पापी जनके समीप बसना चाहिये कारण कि पाकसाधन द्रव्य हाथमें लिये धूपसे मलिन परिश्रमसे युक्त महाबली भीमसेनने रसोईयेकी समान विराटके घरमें क्या निवास न किया ? किन्तु किया (अर्थान्तर न्यास अलंकार शार्दूल-विक्रीडित वृत्त ) ॥ २३५ ॥
यद्वा तद्वा विषमपतितं साधु वा गर्हितं वा कालापेक्षी हृदयनिहितं बुद्धिमान्कर्म कुर्यात् । किं गाण्डीवस्फुरदुरुघनास्फालनक्रूरपाणि- र्नासील्लीलानटनविलसन्मेखली सव्यसाची ॥ २३६ ॥
विषम आपत्ति पडनेपर समयकी प्रतीक्षा करता हुआ बुद्धिमान् जैसा होवे सो भला या बुरा मनके कर्तव्यसे निरूपित कर्म करे, क्या अर्जुनने गाण्डीव धनुषसे स्फुरायमान बडी सघन मौर्वी चढानेसे कठिन हाथवाला होकरभी कौंधनी ( मेखला ) धारण कर लीला नाट्यका विलास न किया ? कियाही ( मन्दाक्रान्ता वृत्त ) ॥ २३६ ॥
सिद्धिं प्रार्थयता जनेन विदुषा तेजो निगृह्य स्वकं सत्त्वोत्साहवतापि दैवविधिषु स्थैर्य्यं प्रकार्य्यं क्रमात् । देवेन्द्रद्रविणेश्वरान्तकसमैरप्यन्वितो भ्रातृभिः किं क्लिष्टः सुचिरं त्रिदण्डमवहच्छ्रीमान् धर्मात्मजः २३७॥
सिद्धिकी प्रार्थना करनेवाले चतुर पुरुष अपना तेज ग्रहण कर बल और उत्साह होनेपरभी दुर्विपत्तिमें धैर्यका आश्रय करते हैं कारण कि श्रीमान् धर्मपुत्र युधिष्ठिर इन्द्र कुबेर यमकी समान बली भाइयोंसे युक्त होकरभी दीर्घकालतक विपत्तिमें पडकर क्या त्रिदण्डधारी ( वनवासी ) न हुए । ( शार्दूल वि०अर्थान्तरन्यास अलंकार है ) ॥ २३७ ॥
रूपाभिजनसम्पन्नौ कुन्तीपुत्रौ बलान्वितौ । गोकर्मरक्षाव्यापारे विराटप्रेष्यतां गतौ ॥ २३८ ॥